दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
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रविवार, 13 अक्टूबर 2024
4275 ..फिल्मी गाने पर 'गरबा' करते देखना आहत कर गया
शनिवार, 12 अक्टूबर 2024
4274 ..दशहरा असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।
सादर नमस्कार
दशहरा असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। रावण के बिना दशहरा अधूरा है। कभी जब गांव में रामलीला का मंचन होता तो उसे देखने के लिए हम बच्चे बड़े उत्साहित रहते। पूरे 11 दिन तक आस-पास जहां भी रामलीला होती, हम जैसे-तैसे पहुंच जाते। किसी दिन भले ही नींद आ गई होगी लेकिन जिस दिन रावण का प्रसंग होता उस दिन उत्सुकतावश आंखों से नींद उड़ जाती। रावण को रामलीला में जब पहली बार मंच पर अपने भाई कुंभकरण व विभीषण के साथ एक पैर पर खड़े होकर ब्रह्मा जी की घनघोर तपस्या करते देखते तो मन रोमांचित हो उठता। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहते तो वह भारी-भरकम आवाज में वरदान मांगते कि-
'हम काहू कर मरहि न मारे।
वानर जात मनुज दोउ वारे।
देव दनुज किन्नर अरु नागा।
सबको हम जीतहीं भय त्यागा।"
अर्थात हे ब्रह्मा जी, यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिये कि मैं देवता, राक्षस, किन्नर और नाग सबको निर्भय होकर जीतूं।" भगवान ब्रह्मा जी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्ध्यान होते तो दृश्य का पटाक्षेप हो जाता।
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024
4273...रतन नवल टाटा नहीं रहे
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024
4272...रेत पर टिकते नहीं घर!
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनीता जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में आज प्रस्तुत हैं पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
आँख भरकर देख लो बस
मुस्कुरा लो साथ मिलकर,
किंतु न बाँधो उम्मीदें
रेत पर टिकते नहीं घर!
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शब्द से ख़ामोशी तक–अनकहा मन का (२६)
करे गर्भ जब अठखेली,धड़कन सरगम बनती,
कोख सींच आशाओं से,मन द्वार सजाती है।।
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गुनाहों का देवता: एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
भारती जी ने समय के सापेक्ष एक अजर अमर साहित्य रचा है. उन्होंने चंदर को महानायक बनाकर नहीं प्रस्तुत किया वरन सामान्य दिखाने का प्रयास किया. हम जिस माहौल में रहते हैं वहाँ अति आदर्श का क्या हश्र होता है…जरा सा मानसिक असंतुलन होने पर भयंकर कुंठा के रुप में किस तरह निकलता है, यह सब दिखाता है यह किरदार. मध्याह्न के पहले से बाद तक कहानी बिल्कुल ही बदल जाती है. *****
अपनी नारंगी चमक के साथ, यह प्यारा कद्दू पतझड़ की सजावट में चार चाँद
लगा देता है। इन दिनों हर घर के एंटरेंस पर कद्दू सजा है जो हमारे भारतीय कद्दूओं
की साइज से कही ज्यादा बड़ा होता है । यहाँ पर कद्दुओं को खोखला कर उन पर कार्विंग
की जाती है और उसके अंदर कैंडल जलायी जाती है जिसे जैक ओ 'लैंटर्न के नाम से जाना जाता है, इसके पीछे एक लोकल कहानी है । एक किवदंती यह
भी है कि कद्दू बुरी आत्माओं को दूर भगाते है इसलिये हैलोवीन में हर घर के
प्रवेशद्वार पर आपको कद्दू मिलेगा।
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
4271..जीवन का आग़ाज़..
।।प्रातःवंदन।।
नवरात्रि की धुन है
शुभ,संकल्पों की गुण है
उपासना के कई तरीक़े
शक्ति स्वरूपा की धुन है।
प्रभाती की धुन आजकल इसी से सज रहीं, प्रस्तुति के क्रम को बढाते हुए नजर डालें..
वह एक सामान्य दिन नहीं था।मैं देर से सोकर उठा था।अभी अलसाया ही था कि ख़ास मित्र का फ़ोन आ गया।ख़ास इसलिए क्योंकि उनसे अमूमन बात नहीं होती।कुछ असामान्य घटित होता है तो वह पहली सूचना मुझे ही देते हैं।इस आशंका से मैं एकबारगी सहम उठा।मैंने डरते-डरते कॉल रिसीव की।उधर से मित्र की भारी सी आवाज़ कानों में पड़ी ‘यार,इस बार भी त्रिपाठी मार ले गया।न जाने साहित्य को कौन-सा ..
✨️
कामना जगी तो
धुआँ-धुआँ कर देती है भीतर
अग्नि आत्मा की बुझ जाती है
बुझती नहीं तो छुप जाती.
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कुछ कहने के लिए किसी ख़ास दिन की ज़रूरत नहीं है वैसे तो … पर अगर दिन ख़ास है तो क्यूँ न उस दिन तो कहा ही जाए … राधे-राधे 😊😊😊🌹🌹🌹🌹🌹
सुना है उम्र की पहली साँस से
होता है जीवन का आग़ाज़..
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देहरी पर अल्फ़ाज़ ......
मन की देहरी पर
लिखे कुछ अल्फाज़
जब उसे लांघ कर
परिकल्पना के
सामने.
✨️
कुओं-तालों में अब पानी नहीं है,
नदी में भी वो तुग़्यानी नहीं है।
सभी के ज़ख्मों पर रखना है मरहम,
किसी को चोट पहुँचानी नहीं है।
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
4270...आत्मा का सूरज जहाँ चमकता है...
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
देवी का आह्वान करने से तात्पर्य मात्र विधि-विधान से मंत्रोच्चार पूजन करना नहीं, अपितु अपने अंतस के विकारों को प्रक्षालित करके दैवीय गुणों के अंश को दैनिक आचरण में जागृत करना है।
व्रत का अर्थ अपनी वृत्तियों को संतुलित करना और उपवास का अर्थ है अपने इष्ट का सामीप्य।
अपने व्यक्तित्व की वृत्तियों अर्थात् रजो, तमो, सतो गुण को संतुलित करने की प्रक्रिया ही दैवीय उपासना है।
देवी के द्वारा वध किये दानव कु-वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे-
महिषासुर शारीरिक विकार का द्योतक है
चंड-मुंड मानसिक विकार,
रक्तबीज वाहिनियों में घुले विकार,
ध्रूमलोचन दृश्यात्मक वृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है,
शुम्भ-निशुम्भ भावनात्मक एवं अध्यात्मिक।
प्रकृति के कण-कण की महत्ता को आत्मसात करते हुए
ऋतु परिवर्तन से सृष्टि में उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा का संचयन करना और शारीरिक मानसिक एवं अध्यात्मिक विकारों का नाश करना नवरात्रि का मूल संदेश है।
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कूदकर देखता हूँ
तो पाता हूँ
वहां वह कठोरता मौजूद है
जो असल जीवन से
अनुपस्थित है।
आत्मा का सूरज जहाँ चमकता है
वहाँ पारदर्शी होता है मन
अग्नि प्रज्ज्वलित होती है
पूरे वैभव में
इच्छा की सुलगती लकड़ियाँ
कोई धुआँ नहीं देती
सारे बीज सुख गये होते हैं संस्कारों के
जो तड़-तड़ कर जलते हैं !
पहले भी है, बाद भी, शरीर एक पड़ाव ।।
शस्त्रों से कटती नहीं, जला न सकती आग।
आत्मा सदैव ही रहे, तू निद्रा से जाग ।।
किसी भी देश और जाति की आत्मा होती है उसकी संस्कृति, उसका ज्ञान, उसका समृद्ध इतिहास जिस पर उसको गर्व होता है ! कोई भी आक्रांता पहले उसी को खत्म या नष्ट करने की कोशिश करता है ! हमारे साथ भी यही हुआ ! हजार साल की पराधीनता की अवधि में हमारे इतिहास को हमारी संस्कृति को, हमारे संस्कारों को बदलने की कोशिश होती रही ! सफलता भी मिली उन लोगों को, क्योंकि रीढ़विहीन लोग हर युग में हर देश में पाए ही जाते हैं ! इन लोलुपों को वही समझाया गया जो उनके आका चाहते थे ! इनको दिया जाने वाला ज्ञान इनके आकाओं द्वारा निर्मित और वहीं तक सिमित था, जहां तक उनकी इच्छा थी ! देश पर हुकूमत के लिए यह जरुरी था नहीं तो देश और बाकी देशवासियों को काबू करने के लिए फौज कहां से आती !
फिल्मी गाने पर गरबा करते देखना
84 छिद्र वाला गरबो 84 लाख योनियों का प्रतीक है जबकि 108 छिद्र वाला गरबो (मिट्टी का घड़ा) ब्रह्मांड का प्रतीक है। इस घड़े में 27 छेद होते हैं - 3 पंक्तियों में 9 छेद - ये 27 छेद 27 नक्षत्रों का प्रतीक होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं (27 * 4 = 108)। नवरात्रि के दौरान, मिट्टी का घड़ा बीच में रखकर उसके चारों ओर गोल घुमना ऐसा माना जाता है जैसे हम ब्रह्मांड के चारों ओर घूम रहे हों। यही 'गरबा' खेलने का महत्व है।
मिलते हैं अगले अंक में।
सोमवार, 7 अक्टूबर 2024
4269 ..दोस्त सच्चा उसे ही समझना सदा, भूलकर भी जो नाराज़ होता नहीं..
सादर अभिवादन




















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