निवेदन।


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शुक्रवार, 13 मार्च 2020

1701...आख़िर यह किसकी साज़िश थी?

सादर अभिवादन। 

संसद में 
दिल्ली दंगों की 
साज़िश पर 
चर्चा हुई
सत्ता पक्ष ने 
विपक्ष की साज़िश
विपक्ष ने 
सत्तापक्ष की साज़िश 
कहा... 
अब जनता पर्दाफ़ाश करेगी 
आख़िर 
यह किसकी साज़िश थी?

-रवीन्द्र सिंह यादव    

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-


 
और हैं मन के सन्नाटे में
यहाँ वहाँ
हर जगह फ़ैली
सैकड़ों अभिलाषाओं की
चिर निंद्रा में लीन



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उसने कर, चर, खप, चटर
सारे सुर लगाए
कंकड़ सा चुभ-चुभ कर
सारे जोर लगाए
हुआ महीन-मुलायम भी, पर .....
मुझे नहीं करनी थी
जो मैंने बात ही नही की।




तभी विपक्षी दल के प्रत्याशी की भी उसी कॉफी-हाउस में एंट्री होती है। जैसे ही दिनों की निगाहें मिली हैं, उनमें आक्रोश के स्थान पर अद्भुत आत्मीयता दिखती है। "भाई साहब " और "भाई जान" के अभिवादन के साथ दोनों एक ही मेज पर आमने-सामने बैठ  ठहाका लगा रहे होते हैं। वे कहते हैं  - " जनाब ! इस बेवकूफ़ जनता के लिए हम-आप क्यों अपने रिश्ते खराब करे। इलेक्शन कोई जीते ,पर यह कॉफी हाउस वाला हमारा भाईचारा कायम रहना चाहिए ..!" 
  

 

जंगल की आग स्वतः ही बुझ गयी। अब शेर विदेश यात्रा से लौट आया। जंगल के जिव-जंतु उससे बहुत नाराज़ थे। ऐसा भी क्या राजा जो दुःख-तकलीफ़ में अपनी प्रजा का साथ छोड़ गया। किसी ने भी उससे बात नहीं की तब उसने सभा में कोयला उठाया और कहा-
"देखो यह कितना उपयोगी है इससे हमारी बहुत प्रगति होगी। यह वृक्ष ज़िंदा लाख के और जले सवा लाख के।"


 

विभिन्न भाव पर रची गयी कुल 101 कविताओं को पढ़कर ही जाना जा सकता है कि कवयित्री में कोमलता, विचार, संस्कार, आक्रोश, प्रश्न, प्यार...हर भाव में लेखनी की प्रखर गूँज है और श्वेत श्याम रेखाचित्र आँखों को सुकून देने वाली कलाकृतियाँ हैं। हार्ड बाइन्ड की पुस्तक आकर्षक कलेवर में है। आगे भी उषा किरण जी की कृतियाँ हमारे समक्ष आएँ , इसके लिए दिल से शुभकामनाएं।
आपका सुनहरी स्याही से अंकित स्वहस्ताक्षरित शुभकामना संदेश एवं साथ में चित्रांकन हमारे लिए अमूल्य हैं



हमक़दम का विषय

यहाँ देखिये

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 12 मार्च 2020

1700.....पलाशी शाम आँखों से बिखरा कहाँ है?

गुरुवारीय अंक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
आज 

पाँच लिंक ने 1700 वाँँ क़दम रखा है
यह संभव हो पाया है
सिर्फ़ और सिर्फ़
आप सभी साहित्य सुधियों एवं
स्नेहिल पाठकों की
वजह से,
आप सभी का
हमारा परिवार हृदय से आभार
व्यक्त करता है।
आप का बेशकीमती साथ एवं
सहयोग सदैव अपेक्षित है।

------

मिज़ाज-ए-मौसम बेतरतीब है,
बरसती बूँदें आसमां के क़रीब हैं।
मय्यसर नहीं दो निवाले सुकून के,
ये जरूरी तो नहीं कि वो गरीब़ हैंं।
सिकुड़ी पेशानी के जाएज़ सवाल,
जो गले मिले दोस्त हैं कि रक़ीब है?

★★★★★

अभी होलियाना ख़ुमार उतरा कहाँ है?
हथेलियों में रची हुई मेंहदी अबीरी,
रंग-भंग,मन-मलंग तन थकन में चूर,
पलाशी शाम आँखों से बिखरा कहाँ है?
★★★★★

पढ़िये मेरे द्वारा संजोये गये सूत्र-

★★★★★

फेसबुक

रवाना करने के बाद शुभकामनाओं की खेप
नजर आती है कोई पकवान की तस्वीर
लीजिये रेसिपी भी मांग ली है किसी ने तो
इसके पहले कि जुबान पर टिकता पकवान का स्वाद
बड़े साहित्यिक जलसे की तस्वीरें नुमाया होती हैं
कौन क्या बोल, किसने क्या सुना से ज्यादा
किससे मिले, कितनी तस्वीरें खिंची
के दृश्य आँखों में झरते चले जाते हैं।


★★★★★

ज़िंदगी


ज़िंदगी की परतों के 
भीतर ही कहीं 
छुपी रहती ज़िंदगी 
जैसे छुपा हो 
हारिल कोई 

हरे पत्तों के बीच 

★★★★★★

रंगोत्सव
रंग रंगीला साजना,करें बहुत धमाल।
फगुआ गाय घड़ी- घड़ी,करके मुखड़ा लाल।।
करके मुखड़ा लाल, मरोड़ी मेरी कलाई।
कोमल सी नार मैं, छेड़ों न मेरी सलाई।
भीगी तृप्ति सोच रही, क्यूँ शिव बूटी माजना।
सांवली सूरत में , रंग रंगीला साजना।।


★★★★★


फ़र्क कहाँ हैं?

पूजा में हाथ जोड़ें,हाँथ बांधें,या दुआ में ऊपर उठाएं,
जब मांगते सभी सलामती ही हैं तो फिर फर्क कहाँ है ?

अम्मी कहें,मॉम या के माँ पुकारें अपनी जननी को,
जब माँ की ममता सामान ही है तो फिर फर्क कहाँ है ?

★★★★★

मन की गति कोई न जाने

कभी अर्श चढ़ कभी फर्श पर
उड़ता फिरता मारा मारा ।
मीश्री सा मधुर और मीठा
कभी सिंधु सा खारा खारा।
कोई इसको समझ न पाया
समझा कोई हर कण हर कण।।

★★★★★★

और चलते-चलते
छिपकली

जब वह बिस्तर पर होती है जैसे कानों में बंसी बज उठती है।वह चौंक कर उठ बैठती है। मगरस्विच आन’ करने पर उसे दिखायी पड़ती है बल्ब के पास दीवाल से चिपकी हुई एक घिनौनी छिपकली।रोज ही वह इसे अपने कमरे से भगाती है मगर न जाने किस वक्त वह रेंगती हुई फिर अपनी जगह आ चिपकती है।उसे देखते ही उसका जी मचलाने लगता है।मगर अंधेरा करते ही उसे लगता है वह उसके मुँह पर आ गिरेगी।वह खाने की मेज पर होती तो लगता उस भोजन के बीच कहीं न कहीं वह छिपकली भी जरूर है।बस कौर उसके गले में चिपकने लगता।बड़ी मुश्किल से दो-चार कौर पानी के सहारे निगल कर वह थाली छोड़ देती।उसे किसी भी गीली या मुलायम चीज में छिपकली का ही आभास मिलता।

★★★★★★

आज का यह अंक आप सभी को कैसा लगा?
आपसभी की प्रतिक्रिया उत्साह बढ़ा जाती है।

हमक़दम का विषय

यहाँ देखिये

कल का अंक पढ़ना न भूलें कल आ रहे हैं
आदरणीय रवींद्र जी विशेष
प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता

★★★★★★




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