निवेदन।


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गुरुवार, 5 मार्च 2020

1693...कोरोना विषाणु (वायरस) से बचाव के 6 आसान उपाय...


सादर अभिवादन।
 
कोरोना विषाणु (वायरस) से बचाव के 6 आसान उपाय-
1. खांसते-छींकते वक़्त रुमाल / टिसू पेपर का प्रयोग करें। 
2. हैंड सेनिटाइज़र (अल्कोहल आधारित विषाणुरोधी द्रव ) 
का प्रयोग करें।
3. संदेह या लक्षणों की स्थिति में अधिकृत 
सरकारी अस्पताल /केन्द्र में संपर्क करें, फेस मास्क का प्रयोग करें। 
4. हाथ मिलाने (हैंडशेक ) से बचें, नमस्ते करें। 
5. 20-30 सेकंड तक हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोयें। 
6. अनावश्यक यात्रा से बचें। 

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

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मन में रख विग्रह
कर दें कब दंगा
धर्म के हैं गुरु,
मत लेना पंगा

( विग्रह = वैर / शत्रुता )

ताशकंद यात्रा – 13 यात्रा का अंतिम दिवस...... साधना वैद 

 आज हमें ताशकंद के लोकल बाज़ार ले जाया जाने वाला था ! सब खुश थे ! शॉपिंग का प्रस्ताव हो और महिलायें प्रसन्न ना हों यह तो हो ही नहीं सकता ! जब तक चेक आउट की औपचारिकताएं चल रही थीं ग्रुप के सभी सदस्यों ने राजकपूर के पियानो के साथ खूब तस्वीरें खिंचवाईं और किताबों का भी खूब आदान प्रदान हुआ ! होटल ग्रैंड प्लाज़ा को फाइनल बाय बाय करने के बाद हम शहर के भ्रमण के लिए चल पड़े !

सिद्ध विवेकी मूढ़ कलम के
घूम रहे गलियों में बढ़के।
 बिकती कविता स्वाद पकौड़ी
शब्दों की चटनी सी चढ़के। 
चाय समोसे जैसी रचना
छंद जले हैं इनसे न्यारे।

मुश्किल पग-पग पे आन पड़ी
जब किया इरादा उड़ने का
फिर डर छोड़ दिया मरने का
यह नारी आज की नारी है
जिसकी लड़ाई सदा जारी है

तभी तुम्हारी किरणों ने आकर 
सपने मेरे तोड़ दिए,
जो तारे माँगे थे अंबर से,
वो अंबर में ही छोड़ दिए।
 .....
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 4 मार्च 2020

1692..हिंसा को दफनाने का हुनर आ जाता..

।। उषा स्वस्ति ।।
हिंसा की भाषा बड़ी सख़्त,बड़ी भारी
और ऎंठी हुई होती है
मृत शरीरों की तरह..
फिर भी कोई इसे न दफ़नाता है
न जलाता है..!!”
कुसुम जैन

खौफ के बादल हटाकर अब सब सहमे - सहमे निकल रहे.. अच्छा होता 
जो हिंसा को दफनाने का हुनर आ जाता..
एक सुलझे सोच के साथ 
नजर डालें आज की लिंकों पर..✍
⚜️⚜️



प्रवक्ता हूँ, सियासत का।
दंगों में हताहत का हाल
सूरते 'हलाल' बकता हूँ,
खबरनवीसों में।
 पहले पूछता हूँ,
थोड़ी खैर उनकी।
दाँत निपोरकर!
सुनाई देती है,
खनकती आवाज,
ग़जरों की महक में मुस्काती
⚜️⚜️



जिन्हें मां की याद नहीं आती
उन्हें मां की जगह किसकी याद आती है?
जिन्हें बहन की याद नहीं आती
उन्हें बहन की जगह किसकी याद आती है?
याद नहीं आती जिन अभागों को अपने बाबा की
उन्हें बाबा की जगह किसकी याद आती है?.....
⚜️⚜️




आ० उर्मिला सिंह जी 
रात भी हो गई दुश्मन क्या करें...
रात भी  हो गई है दुश्मन क्या करें!
नींद आती नही ,पल एक क्या करे!!

सुधियाँ बैठी  रही किये अनशन रात भर
फिज़ाएं खामोश,पुष्प भी मुरझाने लगे 
सही जाती नही, जिन्दगी की ये घुटन 
प्रीत भी होती रही ,घायल रात भर !
⚜️⚜️

डॉ. निशा महराणा जी... 
बहुत याद आती हो रजनी
जहाँ कक्षा के अन्य स्थानीय सहपाठी अपने आप को खास समझते थे वहीं रजनी 
स्थानीय होने के बावजूद बड़े प्यार से बात करती थी। उम्र में छोटी होने की वजह से वो 
मुझे दीदी कहा करती थी। मुझे सचमुच में वो अपनी छोटी बहन सी लगती थी।  
⚜️⚜️



हँसते,
भागते,
खेलते हुए,
सुबह से दोपहर
फिर शाम,
और रात हो जाती है
बदल जाती है तारीख ।
सोचती रहती हूँ,
अभी तो हम मिले थे,
मीलों साथ चले थे,
और किसी दिन
कभी तुम
कभी मैं
गाड़ी में बैठते हुए
हाथ छूते हैं,
कुछ दूर हाथ हिलते हैं..
⚜️⚜️
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
⚜️⚜️
।।इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍

मंगलवार, 3 मार्च 2020

1691...सोशल मीडिया हो गया अब जी का जंजाल...

सादर अभिवादन।

सोशल मीडिया हो गया 
अब जी का जंजाल,
समय गया शाँति गयी 
हो गया कोई कंगाल। 
-रवीन्द्र 

आइए अब आज की पसंदीदा रचनाएँ पढ़ते हैं-



 
दरअसल, श‍िक्षकों के भीतर नेतृत्व क्षमता व श‍िक्षण कार्य में दक्षता प्राप्त करने के ल‍िए सरकार द्वारा सरकारी कार्यालय में चलाए जा रहे ”न‍िष्ठा प्रोग्राम” के दौरान न केवल यह डांस क‍िया गया बल्क‍ि साथी श‍िक्षकों द्वारा श‍िक्ष‍िकाओं पर रुपये लुटाए जाने का वीड‍ियो बनाया गया, फ‍िर उसे वायरल भी क‍िया गया। ये पूरा का पूरा घटनाक्रम श‍िक्षकों की घट‍िया मानस‍िकता को दर्शाता है।


"जानता हूँ, नदी-झरने
जो मुझे थे पार करने,
कर चुका हूँ,  हँस रहा यह देख,
              कोई नहीं भेला."

 
 

उड़ी गुलाल
       बैर भूलादे मन
       खेलो रे खेलो
       सुंदर मधुरस
       मनभावन फाग।


 

बस्ती थी, ये कल-तक,
है अब, ये मरघट,
घुल चुके भंग, इन रंगों में,
धुल चुके हैं अंग,
उड़ चले गुलाल, सपनों से,
अब कैसी, फगुनाहट!

 

साथ ही  समाचार पत्रों में आगे यह भी लिखा हुआ था कि सेठजी का नागरिक अभिनंदन  'भ्रष्टाचार मिटाओ' संस्था के बैनर तले किया जाएगा.. जिस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वयं नये साहब ही होंगे..और दोखीराम जी नये साल में अपनी फैक्ट्री की ओर से किये जाने वाले धर्मार्थ कार्यों जैसे निर्धन कन्याओं का विवाह, गरीब मेधावी छात्रों को आर्थिक मदद और मुहल्ले में स्थित मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए मोटी रक़म देने की घोषणा इसी मंच से करेंगे..।


हम-क़दम-110 का विषय है-
'अभिसार' 

उदाहरणस्वरूप कविवर नरेश मेहता जी की रचना-
 
यह सोनजुही-सी चाँदनी
नव नीलम पंख कुहर खोंसे
मोरपंखिया चाँदनी।

नीले अकास में अमलतास
झर-झर गोरी छवि की कपास
किसलयित गेरुआ वन पलास
किसमिसी मेघ चीखा विलास
मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया
किन्नर रम्भा चाँदनी।

मधु चन्दन चर्चित वक्ष देश
मुख दूज ढँके मावसी केश
दो हंस बसे कर नैन-वेश
अभिसार रंगी पलकें अशेष
मन ज्वालामुखी पर कामप्रिया
चँवर डुलाती चाँदनी।

गौरा अधरों पर लाल हुई
कल मुझको मिली गुलाल हुई
आलिंगन बँधी रसाल हुई
सूने वन में करताल हुई
मन नारिकेल पर गीत प्रिया
वन-पाँखी-सी चाँदनी।
 
साभार : कविता कोश 

आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव
 

सोमवार, 2 मार्च 2020

1690..हम-क़दम का एक सौ नौवाँ अंक...पतवार

स्नेहिल अभिवादन
डाँड़, क्षेपणी, चप्पू, पतवार या पाल से चलने वाली एक 
प्रकार की छोटी जलयान है। आजकल नावें इंजन से 
भी चलने लगी हैं और इतनी बड़ी भी बनने लगी हैं कि 
पोत (जहाज) और नौका (नाव) के बीच भेद करना कठिन 
हो जाता है। वास्तव में पोत और नौका दोनों समानार्थक शब्द हैं, 
किंतु प्राय: नौका शब्द छोटे के और 
पोत बड़े के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

उदाहरणार्थ ली गई रचना
कालजयी रचना में पढ़िए पतवार को -
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार


आज सिन्धु ने विष उगला है

लहरों का यौवन मचला है

आज हृदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी न मानी हार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार 

एक और रचना पढ़िए
 स्मृति शेष भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेई रचित


चीर चलें सागर की छाती, पार करे मँझधार
ज्ञान केतु लेकर निकला है, विजयी शंकर
अब न चलेगा ढोंग, दम्भ, मिथ्या आडम्बर

.......
नियमित रचनाएँ
.........
आदरणीय आशा सक्सेना
छूटी हाथों से पतवार
सह न पाई वायु का वार
नाव चली उस ओर
जिधर हवा ले चली |
नदिया की धारा में नौका ने    
बह कर किनारा छोड़ दिया
बीच का मार्ग अपना लिया
चली उस ओर जिधर हवा ने रुख किया


आदरणीय कुसुम कोठारी
हंसते  हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी ज़वाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं।

टूटी कश्ती वाले हौसलों  की पतवार  लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले  साहिल पर नाव  लिये बैठे हैं।


आदरणीय मीना शर्मा
पतवार तुम्हारे हाथों है,
मँझधार का डर क्यों हो मुझको ?
इस पार से नैया चल ही पड़ी,
उस पार का डर क्यों हो मुझको ?

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा
पतवार जीवन का

खे रहा पतवार जीवन का,
चल रहा तू किस पथ निरंतर,
अनिश्चित रास्तों पर तू दामन धैर्य का धर,
है पहुँचना तुझे उस कठिन लक्ष्‍य पर।




आदरणीय कामिनी सिन्हा
आकाश अवनी के दोनों हाथों को पकड़कर चूमते हुए बोला - " मेरे जीवन के नईया की तुम्ही पतवार हो ....अगर तुम मेरे साथ हो तो मैं भँवर  में भी फंसा रहूँगा न ,तो भी किनारा पा लूँगा। "अवनी मुस्कुराती हुई उलाहना देने के अंदाज़ में बोली - "अच्छा जी , जब इतना ही भरोसा था तो ये रुआँसा सा मुँह लटकाए क्यूँ थे।" मैं बहुत डर गया था अवनी - कहते हुए आकाश रो पड़ा।

आदरणीय उर्मिला सिंह
आशा की पतवार....
नाविक ले चल दूर कहीं दूर.......
जहाँ विश्वासों की कश्ती हो...
आशा की हो पतवार...
हम हो तुम हो और हो अपना प्यार.....
नाविक ले चल दूर कहीं दूर......


आदरणीय सुजाता प्रिय
प्रभु आज पकड़ पतवार इसकी
मेरी नैया डगमग डोले रे,
प्रभु आज पकड़ पतवार इसकी।
लहरों में खा हिचकोले रे,
प्रभु आज पकड़ पतवार इसकी।


आदरणीय साधना वैद
भर ले अपनी झोली

मन की नौका को
तट पर लाना है तो
सागर की उत्ताल तरंगों से
कैसा घबराना !
डूब जायें या तर जायें
पतवार उठा कर
नाव को तो खेना ही होगा !


आदरणीय साधना वैद
लक्ष्य ....

अर्जुन की तरह
 अपने लक्ष्य पर
टकटकी लगाये बैठा हूँ मैं
लहरों पर धीरे-धीरे बहती 
अपनी डगमगाती नौका पर !
पास में है खण्डित पतवार
और मन के तूणीर में
जीवन के रणक्षेत्र से बटोरे हुए
भग्न, आधे अधूरे,
बारम्बार प्रयुक्त हुए चंद तीर


आदरणीय विश्वमोहन कुमार
प्लेटलेट्स की पतवार 
प्लेटलेट्स की पतवार फंसी 'डेंगी' में।
उलझती अटकती साँसे,
फकफकाहट।
'अविनाश' मासूमियत,
मद्धिम सी आँखों में झूलता
बेबस बाप की अकबकाहट!
आरोग्य चौखट से दुत्कारी गयी


आदरणीय ज्योति खरे
दोस्तो मेरे पास आओ ....
तूफानो को
पतवार से बांध दिया है
बहसों, बेतुके सवालों
कपटपन और गुटबाजी की
राई, नून, लाल मिर्च से
नजर उतारकर
शाम के धुंधलके में
जला दिया है



आदरणीय अनुराधा चौहान
दिल की नैय्या ...

ढलते-ढलते साँझ चली जब ,
कहती मन उजियारा करले‌।
उड़ने चला पखेरू बनकर ,
मन को अपने काबू करले।
पंछी उड़ते कलरव करते,
साँझ घनी होने वाली है।
भावों के अथाह सागर में,
दिल की नैया क्यों खाली है।
सहसा ही जब तंद्रा टूटी,
लगा रैन होने वाली है।


आदरणीय ऋतु आसूजा
जीवन की पतवार ...

भागती-दौड़ती जिन्दगी की रफ्तार
ढील देता पतवार
क्षीण तार लहूलुहान
सम्भल जा मानव.....
तन के पिंजरे में
कैद सांसों के
जोड़ की तार
हृदय प्राणवायु
की पतवार ......


....
इतनी ही रचनाएँ ही प्राप्त हुई है
वजह आप जानें
सादर


रविवार, 1 मार्च 2020

1689....बरसों की आरी हँस रही थी घटनाओं के दाँत नुकीले थे


जय मां हाटेशवरी......
स्वागत है आप का.....
बरसों की आरी हँस रही थी
घटनाओं के दाँत नुकीले थे
अकस्मात एक पाया टूट गया
आसमान की चौकी पर से
शीशे का सूरज फिसल गया

आँखों में कंकड़ छितरा गए
और नज़र जख़्मी हो गई
कुछ दिखाई नहीं देता
दुनिया शायद अब भी बसती है----अमृता प्रीतम 
अब पेश है....मेरी पसंद.....

  ग़ज़ल - चिढ़ है जन्नत से
कितना ही कमज़ोर हो पर अपने दुश्मन से ,
होशियारी और सब तैयारियों से लड़ ।।10।।
टाट पे मखमल का मत पैबंद सिल रे ,
क़ीमती हीरे को लोहे में नहीं जड़ ।।11।।

कविता : खेल
तबसे बच्चे
घरों में कैद हैं
धर्म सड़कों पर है
और खूँटियाँ सरों पर
अब बड़े खेल रहे हैं






दर्द की तलाश
नीरस हो गई है ज़िन्दगी,
अतिरेक हो गया है सुख का,
जीने के लिए अब दर्द ज़रूरी है.
थक गया हूँ मैं
दर्द खोजते-खोजते,
कोई मुझे सही-सही बताए
कि आख़िर दर्द कहाँ रहता है.
गीत अक्सर गुनगुनाया करो
आईना यूँ भी हम से कहता है , तू जो सोचता है
दिखता है , खुद को यूँ भी न भुलाया करो
आह से भी तो उपजता है गान
गाने लगती है सारी कायनात , ये कभी न भुलाया करो
बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत
महफूज़ नहीं इन्सां पहलू में जिंदगी के ,
मजरूह करे जिंदगी मरहम मौत है .
.................................................................
करती नहीं है मसखरी न करती तअस्सुब,
मनमौजी जिंदगी का तकब्बुर मौत है .
................................................................








धन्यवाद।
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