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गुरुवार, 1 मार्च 2018

958...सुना है फिर से आ गयी है होली...

सादर अभिवादन

प्रेम और भाईचारे का त्यौहार होली फिर आ गया 
ख़ुशनुमा एहसास के साथ। 
परम्पराएँ  हमारी संस्कृति में रची-बसी हैं जिनमें 
समय के साथ परिवर्तन होते रहे हैं। 
परिवर्तन विकृति में न बदल जायें इसलिए समय का 
सामाजिक व्यवहार अपने सशक्त दख़ल से विकृतियों को 
दूर करने के उपाय करता रहता है। 
आजकल होली में भी अनेक विकृतियां शामिल हो गयी हैं 
जिन पर मनन करना ज़रूरी है। 

आपको होली की शुभकामनायें। 

चलिए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर  ले चलते हैं -

गत वर्ष से अब तक बहुत कुछ बदला है लेकिन आदरणीय प्रोफ़ेसर सुशील सर की इस रचना का असर आज भी बरक़रार है- 


चल चढ़ाये भंग 
उड़ायें रंग 
जगायें ख्वाब 
सिमटे हुऐ 
सोते हुऐ 
यहाँ से 
वहाँ तक 
के सभी के 
जितने भी दिखें 
समय के 
साथ लटके हुऐ

आंचलिकता का अनुपम सौंदर्य और भाषा की कलात्मकता बिखेरती 
आदरणीय विश्व मोहन जी की एक रचना -


My photo

बरसाने मुरझाई राधा
कान्हा, गोपी-कुटिल फंसायो
मोर पिया निरदोस हयो जी
फगुआ मन भरमायो
जुलमी फागुन! पिया न आयो!

जीवन के विविध रंगों को बिखेरती 
आदरणीय महेंद्र वर्मा जी की एक रचना -


अमराई की छांव में, फागुन छेड़े गीत
बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत।

फागुन और बसंत मिल, करे हास-परिहास
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास।

तन्हाई में भावों को मुखरता प्रदान करती एक दार्शनिक अंदाज़ की रचना आदरणीय सुधा सिंह जी 

ओढाती है मुस्कुराहट का आन्चल
लोगों को वह रूप दिखाने को!
जो उसका अपना नहीं,
बल्कि छीना गया है
अपने ही पोषक से!

देश के मौजूदा माहौल में आम आदमी से तीख़े सवाल करते हुए आदरणीय गोपेश जसवाल जी की एक रचना-


मेरी फ़ोटो


कितने नीरव औ विजय, रोज़ बनाते हैं वो, 
तू करमहीन, गरीबी में ही, मरता क्यूँ है? 
उनके जुमलों पे, भरोसा तो दिखाता है तू ,
फिर बता मुझको, कि मुंह फेर के, हँसता क्यूँ है? 

आजकल लेटर ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग की चर्चा ख़ूब गर्म है जिसे और 
विस्तार से समझा रहे हैं आदरणीय हर्ष वर्धन जोग साहब अपने सारगर्भित आलेख में - 

देसी बैंक का खातेदार या फिर फिरंगी बैंक का खातेदार फर्जीवाड़ा कर 
रहे हों. या दोनों खातेदार मिले हुए हों और हीरों की जगह कंचे भेज रहे हों.
 या फिर माल सस्ता हो और कीमत ज्यादा बताई जा रही हो.
बहरहाल हीरे बहुत कीमती होते हैं और इसलिए इनके साथ जुड़ा है 
कालाधन और काले धन से जुड़ा है फिल्म जगत और 
नेतागण तो फिर घपले और अपराध भी दूर नहीं हैं.



आदरणीया सुधा देवरानी जी की एक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति जोकि सराबोर है 
जीवन के विविध रंगों से ,कोमल एहसासों से-  



कोई बदरी संदेशा ले के आई  क्या ?
आसमां ने प्रेम-पाती भिजवाई क्या....??
प्रेम रंग में भीगी भीगी
आज मदहोश सी हो......

चलते-चलते आपकी सेवा में 
आदरणीया अभिलाषा जी का एक सवाल-

उनके हवाले कर दिया हमने तुमको
जो हमसे ज़्यादा अजीज़ थे
शिकायतें अब तो और भी बढ़ गयीं
ये हक़ है तुम्हारा या मेरे चाहने की शिद्दत?


हम-क़दम के आठवें क़दम
का विषय...

आज के लिये बस इतना ही। 
मिलते हैं फिर अगले गुरूवार। 
कल आ रही हैं श्वेता सिन्हा जी अपनी रंगबिरंगी प्रस्तुति के साथ। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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