|| सादर नमस्कार ||
"प्रेम"
इस शब्द में
छुपे व्यापक और
गूढ़ अर्थ को शब्दों में
परिभाषित करना आसान
हो सकता है परंतु इसकी अनुभूति
का लौकिक आनंद अभिव्यक्त कर पाना
संभव नहीं। आज के युग में प्रेम एक वस्तु
की तरह हो गया है जिसे लोग अपनी सुविधाके
अनुसार इस्तेमाल करते हैं। स्मार्टफोन संस्कृति
के दायरे में सिमटते विचार, डिजिटल होते
रिश्तों के दौर में प्रेम उस फैशन की तरह
है जिसकी गारंटी देना आपके पुरानपंथी,
रुढ़िवादी और सड़ी-गली वैचारिक
पिछड़ेपन की निशानी मानी
जाती है।प्रेम का आकर्षक
बाजारवाद युवाओं
को आकर्षित
करने में
पूर्णतः
सफल रहा है। तभी तो किसी भी अनुभूति और भावनाओं से बढ़कर प्रेम का प्रदर्शन ही प्रेम का पैमाना बन गया है।
इस शब्द में
छुपे व्यापक और
गूढ़ अर्थ को शब्दों में
परिभाषित करना आसान
हो सकता है परंतु इसकी अनुभूति
का लौकिक आनंद अभिव्यक्त कर पाना
संभव नहीं। आज के युग में प्रेम एक वस्तु
की तरह हो गया है जिसे लोग अपनी सुविधाके
अनुसार इस्तेमाल करते हैं। स्मार्टफोन संस्कृति
के दायरे में सिमटते विचार, डिजिटल होते
रिश्तों के दौर में प्रेम उस फैशन की तरह
है जिसकी गारंटी देना आपके पुरानपंथी,
रुढ़िवादी और सड़ी-गली वैचारिक
पिछड़ेपन की निशानी मानी
जाती है।प्रेम का आकर्षक
बाजारवाद युवाओं
को आकर्षित
करने में
पूर्णतः
सफल रहा है। तभी तो किसी भी अनुभूति और भावनाओं से बढ़कर प्रेम का प्रदर्शन ही प्रेम का पैमाना बन गया है।
आइये अब चलते है हमारे आज के रचनाकारों की दुनिया में
अद्भुत भाव और सुंदर शब्दों से श्रृंगारित बहुत सुंदर रचना पढ़िये आदरणीया मीना जी की कलम से प्रसवित
प्राणों की वर्तिका,
बुझी-बुझी अनंत काल से !
श्वासों के अब सुमन
लगे थे, टूटने ही डाल से !
यूँ लगा था, आत्मा
बिछड़ गई हो देह से !
◆◆◆◆◆◆◆◆
जीवन के रंगों को शाब्दिक मोती में पिरोना
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की ख़ासियत है पढ़िये उनकी लेखनी से

यूँ अनाहूत ही आ जाना,
बिन कुछ कहे यूँ ही चल देना,
भीगी पलकों से बस यूँ रो लेना,
यूँ एकटक क्षितिज देखना,
मनमाना बेगाना सा ये जीवन,
कुछ ऐसा ही है जीवन.....
◆◆◆◆◆◆◆
हृदय के महीन मनोभावों की संवेदनापूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति
आदरणीया रेणु जी की कलम से
सब कुछ था पास हमारे --
फिर भी कुछ ख्वाब अधूरे थे ,
तुम बिन ना सुन पाता कोई -
वो मन के संवाद अधूरे थे ;
जीवन से ओझल साथी -
ये उमंगों के सिलसिले थे
जब हम तुमसे ना मिले थे !!!!!!
◆◆◆◆◆◆◆
हिंदी और उर्दू शब्दों के मिश्रण से भावों की अनोखी छटा बिखेरती सुंदर रचना आदरणीया पम्मी जी कलम से

ताब है कई रंगों की
हुनर है ,संगतराशी की तो..
तुम एक इन्द्रधनुषी ख्वाब तो देखों,
ज़हन के कैनवास पे फिर
इक नई कलेवर में निखर ,
आज वो उम्मीद फिर मुस्कराता है ..
◆◆◆◆◆◆◆◆◆
बेहद गहन भाव और शानदार शब्द संयोजन से गढ़ी गयी
आदरणीया वंदना जी की लाज़वाब अभिव्यक्ति
मैं विस्तारित अनंत का वो राग
जिस पर न गुनगुनाया कोई गीत
मैं किसी छोर का कोई अछोर
जिसे पकड पाया न कोई मीत
◆◆◆◆◆◆◆

थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए
कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ
है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ
◆◆◆◆◆◆◆
तू जाम छलकता बेहिसाब है।
हर हुस्न के लबों का खिताब है
हर रूप तेरा बस लाजवाब है।
हर रूप तेरा बस लाजवाब है।
◆◆◆◆◆◆◆◆
हम-क़दम
सभी पाठकों के लिए एक खुला मंच है
हमारा नया कार्यक्रम
हम-क़दम
आपका हम-क़दम अब पाँचवें क़दम की ओर.....
इस सप्ताह का विषय है...
...यह चित्र
:::: पहाड़ी नदी ::::
परिलक्षित हो रहे दृष्यों को आधार मानकर
आपको एक कविता लिखनी है-
उदाहरणः
बनाती राह ख़ुद अपनी सँवारे ज़िन्दगी सबकी,
पाले गोद में सबको करे ना बात वो मजहब की।
करे शीतल मरुस्थल को वनों को भी दे जीवन,
सींचकर फसलों को वो खेतों को दे नव यौवन।
करे निःस्वार्थ वो सेवा न थकती है न रुकती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥
आप अपनी रचना शनिवार 10 फरवरी 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं
आगामी सोमवारीय अंक 12 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जायेंगीं। इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक




