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शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

931...अलबर्ट पिंटो को गुस्सा आज भी आता है

सादर नमस्कार
एक बार फिर से सालाना हिसाब-किताब के पन्ने पर जनमानस के 
कुछ ख़्वाबों के जोड़-घटाव को शब्दों में लिख दिया गया।
हम सभी जेब को भींचे टकटकी बाँधे एक दूसरे की थालियों में ताक रहे हैं, किसके हिस्से में कितनी रोटी आयी या जो रोटी मेरी थाली में है 
उसमें से कितनी निकाल ली गयी।
संतुष्टि-असंतुष्टि की चादर की खींचा-तानी से जूझते अपने जीविकोपार्जन के गणित से ताल-मेल करते, उम्मीद का दामन पकड़े, हम देश के आम नागरिक लोकतंत्र के इस खेल से पीड़ित  बुद्धिजीवी तमाशबीन हैं। वैसे बज़ट के आँकड़े आधा से ज्यादा आबादी के 
समझ से बाहर होती है यह भी सच है।

चलिए अब आज की रचनाएँ पढ़ते हैं

अंतर में धीरे-धीरे जमा लावा एक दिन अवश्य ज्वालामुखी के रुप में फूटता है आदरणीय ज्योति खरे जी की लेखनी से 

इंसानियत मरने लगी है
कीटनाशक गोलियों से 

छाप रहा झूठी खबर 
बिक हुआ अखबार

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समाजिक व्यवस्था के आडंबरों से खिन्न मन से उत्पन्न तीखे  प्रश्न आदरणीय ध्रुव जी की ओजपूर्ण अभिव्यक्ति 

विमुख नहीं, मैं आज भी हूँ 
कट्टर पुजारी धर्म का। 
एक 'अनुत्तरित' प्रश्न भी है 
मुझको बता दो !
धर्म क्या ?
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कुछ भूली-बिसरी यादें जेहन से नहीं मिटती है 
आदरणीय रश्मि जी की मख़मली लेखनी से


नहीं देखा
बहुत दिनों से 
नाज़ुक कोंपलों पर

ऊँगलियाँ फिराते

कबूतरों के झुंड को
धप्प से कूदकर डराते
रात को
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बसंत कवियों का प्रिय विषय रहा है 
आदरणीय रवींद्र जी की कलम से एक खूबसूरत रचना

मस्त फ़ज़ाऐं 
गुनगुनी धूप है 
हरे शजर 

ढाक-पलाश 
सुर्ख़ हुआ जंगल 
महके फूल 
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जंगल शायद एक दिन तस्वीरों में ही नज़र आयेगे 
आदरणीया  प्रीति "अज्ञात" जी की एक विचारणीय रचना
अतिक्रमण, किसने किया है किस पर
आह! देखती हूँ जब भी गगनचुम्बी इमारतें 
मेरे भीतर एक जंगल अचानक 
लहलहाकर गिर पड़ता है 
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मानवीय संबंधों के महीन धागों को बुनना 
आदरणीया साधना दी बख़ूबी जानती है उनकी कलम से
उलझन
रुग्ण पंखों वाला असहाय पंछी
दूर आसमान में अन्य पंछियों की तरह
क्या कभी वांछित ऊँचाई पर उड़ पाता है ?
मेरा यह पागल मन 
ना जाने क्यूँ
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जीवन का सार बताती, सद्कर्मों के लिए प्रेरित करती 
आदरणीया सुधा जी की कलम से
माटी ही तेरी है सब कुछ,
माटी पर रहना सीख ले!
यह माटी सब कुछ देती है,
पर वापस भी ले लेती है!

माटी से जीना सीख ले!
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हृदय में भावों के ज्वार उमड़ पड़े आदरणीया अनु जी की 
संवेदनशील लेखनी से प्रवाहित बहुत सुंदर रचना
तुम्हारे कहने से चलो मुस्कुरा देती हूँ
मुझे आती नहीं
मुस्कुराहट  तुम्हारी  तरह

न ही आती है

आंखों को नीचेकर 
शरमाने की कला
मेरी संवेदनाएं तो यहीं से 
झाकतीं हैं
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डॉ, सुशील सर के अखबार की पुरानी कतरन
समझ ले 
अच्छी तरह ‘उलूक’ 
अपने ही सिर के 
बाल नोचता हुआ 
खींसें निपोरता हुआ 
एक अलबर्ट पिंटो 
हो जाता है 

और किसी को 
पता नहीं होता है 
उसको गुस्सा 
क्यों आता है ।
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आज के लिए इतना ही
आप सभी के बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में
श्वेता
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पाठकों के लिए खुला मंच है हमारा नया कार्यक्रम 
"हम-क़दम"
इसकी नवीनतम कड़ी में हमने आपको सृजन के लिए दिया है शब्द 
"इंद्रधनुष"
उदाहरणः
इंद्रधनुष,
आज रुक जाओ जरा,
दम तोड़ती, बेजान सी
इस तूलिका को,
मैं रंगीले प्राण दे दूँ,
रंगभरे कुछ श्वास दे दूँ !
पूर्ण कर लूँ चित्र सारे,
रह गए थे जो अधूरे !
इस कार्यक्रम में  भागीदारी के लिए 
आपका ब्लॉगर  होना ज़रूरी नहीं है। 
इस बिषय पर आप अपनी रचनाऐं हमें आगामी 
शनिवार 3 फरवरी 2018 शाम 5 बजे 
तक  भेज सकते हैं। 
 चुनी गयी रचनाऐं 

आगामी सोमवारीय अंक 5 फरवरी 2018 में प्रकाशित होंगीं। 

इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछला गुरुवारीय अंक 


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