सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
उलझन में हूँ
मैं किस काबिल हूँ
कविता आज और अभी
चाँद को मुट्ठी में ले सकूँ
सपनों से नींदें भरती हूँ
आंधियों में भी हरदम
दीपक बनकर जलती हूँ
उलझन में हूँ
सभी परेशान हैं ब्लॉग की स्थिति सेफिर परेशानी क्यूँ फैली है
कवि की निगाहों से बच नहीं पाया है, जिसमें
’’एक -एक इंच का /किया गया है सही -सही उपयोग /ध्यान रखते हुए
कि /कोई सब्जी छुपी न रह जाय/किसी और की ओट में /इतनी कम जगह में /
इतनी सारी सब्जियों को /देना उचित स्थान /किसी कला से कम नहीं।’’
कविता
आपको कैसे पता नहीं होगा
सिद्धार्थ के अंतद्वंद, हाहाकार को
जो उन्हें मोमबत्ती की तरह
गलाये जा रही थी
और आपको निरंतर
जलाये जा रही थी
कविता
छोटे, बहुत छोटे अदने
आदमी से बात करना और
उसकी सुनते चले जाना
पाओगे जमाने की
लतकार फटकार के बीच
उसके पास है हजारों किस्से
कविता क्या है

जबाब ढूँढ़ ... फिर मिलते हैं