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सोमवार, 6 नवंबर 2017

843....''धुँधले तारे''

इन छोटे -छोटे नन्हें हाथों ने कई बार प्रयत्न किया है 
कुछ लिखने का ,पढ़ने का 
माँ -बाप के कठिन मज़दूरी के पीछे छुपी उनकी मज़बूरी की कहानी। 
गर्म ईंट -भट्ठों की गर्मी में तपती उनकी इच्छायें हमें क़ाबिल बनाने की 
पा न सके हालात की मज़बूरियों के चलते, हमको दिलाने की। 
सत्य है हम उनकी प्रथम पीढ़ी हैं !
चढ़ने चलें हैं सीढ़ियां उस शख़्स के सहारे 
कुछ ग़ैरत बची है जिनमें 

कोई मूर्धन्य कवि नहीं, न ही हम हैं साहित्यकार 
परन्तु इच्छा अवश्य है ! लिखने की अपनी 

"संघर्षगाथा"

आज़ का अंक हमारे पाठकों के लिए विशेष है कई मायनों में 
इन 'बालकवियों' की अनोखी कवितायें,जिन्हें आज मैंने 
आगामी 'बालदिवस' के अवसर पर लिंक की हैं। जिन्हें आपके प्यार ,प्रोत्साहन और मार्गदर्शन की विशेष आवश्यकता है। 
तो चलिए चलते हैं इनकी नन्हीं बगिया में   
"अपना घर" 

सादर अभिवादन। 

"मैंने देखा एक सपना".....  
कवि: समीर कुमार, कक्षा 6th,कानपुर


 जन्नत जैसा घर है अपना,
मैंने देखा रात को सपना |
सपने में एक चिड़िया आई, 
उसने बोला सुन मेरे भाई |

"होली"....
कवि: कामता, कक्षा 5th,कानपुर
  होली आया होली आया,
साथ में रंगों की गोली लाया |
दुश्मनी भूल हाथ मिलाया,
दुश्मनी को दूर भगाया |

 सीखो ..
कवि - देवराज , कक्षा - 7th,अपनाघर 

 फूलों से मुस्काना सीखो, 
चिड़ियों से यूँ गुनगुनाना सीखो | 
हवाओं से लहराना सीखो, 
समंदर से यूँ झूमना सीखो |  

 " यह राही की आवाज़ है " 
कवि : अखिलेश कुमार ,कक्षा : 7th , अपनाघर  

 वह सफलता ही क्या, 
जो सरलता से मिल जाये | 
वह राही क्या, 
जो कठिनाइयों से पीछे हठ जाये |

 " स्वच्छ भारत "  
कवि : समीर कुमार , कक्षा: 7th , अपनाघर

 चलो - चलो यारा कुछ नया करें ,
गन्दगी को इस देश से साफ करें | 
भूलने की बीमारी को छोड़कर,
नदियों से नहर को मोड़कर |

 " आसमान को छूकर आएंगे" 
कवि : कुलदीप कुमार ,कक्षा :6th  ,अपनाघर  

हम पकड़कर और छूकर आएंगे, 
    पृथ्वी को स्वच्छ और सुंदर बनाएंगे | 
जगह - जगह से हम कूड़ा उठाएंगे,
    भारत को स्वच्छ और सुंदर बनाएंगे |  

  " वो सुबह कब आएगी "
कवि : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 8th , अपनाघर

 दुःख के मंजर न होंगे, 
खुशियों के समंदर होंगे | 
जहाँ अपना पराया छोड़कर, 
देश में एकताएँ होगी |  
वो सुबह कब आएगी | |

 " अपने आप को पहचानो "
कवि : रविकिशन , कक्षा : 8th ,अपनाघर 

 इंसान अपने आप को पहचानो, 
अंदर छिपे हुए रहस्य को जानो | 
इंसान अपने आप को पहचानो, 
खुद करो काबिलियत जगजाहिर, 
जिसमें हो तुम सबसे माहिर |  

 "माँ"
कवि : ओमप्रकाश , कक्षा : 6TH , अपनाघर

माँ होती है सबसे पारी, 
सुनती है हर बात हमारी | 
खाना भी वो खिलाती है, 
सपनों में वो आती है | 

एक 'अनोखा' परिचय 

बाल सजग एक हकीकत भरा प्रयास जिसके लिए हम सभी बच्चें कोशिश में लगे है. हमारे सपने, हमारी उमंगे हमको भी चाहिए एक जमीन जो हमारी हो, जिसके लिए किसी का मुहँ न देखना पड़े. हम भी लिखना चाहते है, सोचना चाहते है और घिसी-पिटी पढाई को छोड़ नया कुछ पढ़ना चाहते है, जो हमारे दोस्तों ने लिखा हो, जो हमने लिखा हो. बाल सजग एक ऐसा ही प्रयास है. हम सभी ईंट-भठ्ठों पर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चें है. हमारे बचपन का अधिकतर समय ईंट की पथाई में गुजरा है, दहकतियों भट्ठियों में झुलसा है. ईंट-भठ्ठों की तपिश में न मालूम मासूम बचपना कंहा खो गया. हमको नहीं मालूम की जांत- पात, उंच - नीच क्या होती है, और हम जानना भी नहीं चाहते है ... हम जानना चाहते है कि, शेर खीरा ककड़ी क्यों नहीं खाता, आसमान के तारों पर कौन रहता है. हम सब कुछ जानना चाहते है, जो हमारे मन में आते है. तमाम ख्वाब आपके है,पर कुछ हमारे भी है. हम अपने ख़्वाबों को आपके साथ जीना चाहते है. .. "बाल सजग" 


"एकलव्य" 
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