सादर अभिवादन....
जैसे-जैसे 31 जुलाई पास आ रही है
देवी जी के मुख पर निराशा छा रही है
जैसे-जैसे 31 जुलाई पास आ रही है
देवी जी के मुख पर निराशा छा रही है
वो इसलिए नहीं कि पता नही सही होगा कि नहीं
निराशा इसलिए...कि पाँच लिंकों का आनन्द का
कैसे क्या होगा.... मेरे पास दिलासा का
सारा स्टॉक खत्म हो गया....
आखिरी में कह दिया.....
सारा स्टॉक खत्म हो गया....
आखिरी में कह दिया.....
किसी का कुछ नहीं होगा समझ कर जाओ.....
चलिए एक नज़र आज की पसंद पर...

कोई खलिश सी है दबी, शायद उस धड़कन में!
ऐसे गुमसुम चुप, ये पहले कब रहता था?
कोई एहसास है जगी, शायद उस धड़कन में!
संवेदनाओं के ज्वर, अब अकेला ही ये सहता है?

धूप की कतरनें ....श्वेता सिन्हा
हृदय के चौखट पर बनी अल्पना में
मिल गयी रंगहीन बूँदे,
भर आये मन लबालब
नेह सरित तट तोड़ कर लगी मचलने,
मौन के अधरों की सिसकियाँ
शब्दों के वीरान गलियारे में फिसले,

धूप की कतरनें ....श्वेता सिन्हा
हृदय के चौखट पर बनी अल्पना में
मिल गयी रंगहीन बूँदे,
भर आये मन लबालब
नेह सरित तट तोड़ कर लगी मचलने,
मौन के अधरों की सिसकियाँ
शब्दों के वीरान गलियारे में फिसले,

अपने आप से बात करता
वह बूढ़ा बड़ा अजीब लगता है,
बेपरवाह, बेख़बर,
बस चलता जा रहा है
अपनी ही धुन में,
ख़ुद से ही बतियाता.
नर नपुंसक ... विश्वमोहन
छल कपट खल दुराचार से
सती सुहागन हर जाती हो
देवी देती अगिन परीछा,
पुरुषोत्तम का घर पाती हो
नर नपुंसक ... विश्वमोहन
छल कपट खल दुराचार से
सती सुहागन हर जाती हो
देवी देती अगिन परीछा,
पुरुषोत्तम का घर पाती हो

कर्ण तुम मेरे भीतर जीते हो
लेकिन मैंने अपनी दानवीरता पर
थोड़ा अंकुश लगाया है
एड़ी उचकाकर देख रही हूँ
तुम कहाँ सही थे
और कहाँ गलत !!!
कुछ आते हैं
कुछ जाते है
कुछ पढ़ते हैं
कुछ लिखते है
कुछ कुछ भी
नहीं करते हैं
बस कुछ करने
वालों से कुछ
दुखी हो जाते हैं

