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गुरुवार, 29 जून 2017

713....क़ैद करोगे अंधकार में

सादर अभिवादन !
साल का 180 वां दिन है आज।
विक्रम संवत् 2074  आषाढ़ शुक्ल छठी तिथि दिन गुरूवार।
हमारा  709 वां अंक 25  जून को शीर्षक 
हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी सबसे अलग होती है 
ये बहुत ही साफ बात है
नाम से प्रकाशित हुआ था जिसे आदरणीय यशोदा जी ने 
बेहतरीन रचनाओं के साथ पेश किया था।
हमारे आदरणीय प्रोफ़ेसर डॉ. सुशील  कुमार जोशी जी की यह रचना 
सोचनीय सवालों को हमारे समक्ष खड़े करती है।   
इस रचना  पर  मेरी टिप्पणी पर चर्चा को मीना शर्मा जी,
दीपक भारद्वाज जी और विश्व मोहन जी ने आगे बढ़ाया है।
उपयोगी और सारगर्भित बिंदुओं को जोड़ा है। 
हिंदी के विस्तार और सृजन पर सारगर्भित चर्चाओं
का आयोजन होना चाहिए ताकि नयी पीढ़ी 
कुछ आत्मसात कर सके और हिंदी के
वैभवशाली इतिहास को समझ सके
और सर्जना में अपना यथोचित
योगदान दे सके।   
साथ ही हिंदी की धरोहर को सहेजने का सलीका भी सीख सके। 
                                     
चलिए अब आपको आज की रचनाओं की ओर ले चलते हैं -

लाख अँधेरे छाए हों फिर भी आशावाद का स्वर हमारी मायूसी को दूर भगा देता है।  भाई कुलदीप जी की यह रचना नई कविता के आयाम पेश करती है -

क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन




महानगरीय सभ्यता ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है जिसे बखूबी पेश किया है 
मीना शर्मा जी ने अपनी इस रचना में - 
अंतर्जाल के आभासी रिश्तों में
अपनापन ढूँढ़ने की कोशिश,

सन्नाटे से उपजता शोर

उस शोर से भागने की कोशिश !

जीवन के विविध रूप पेश करती डॉक्टर सुभाष भदौरिया जी की ख़ूबसूरत रचना -

बीच में अपने जो दूरियां हैं.

बीच में अपने जो दूरियां हैं.

कुछ तो समझो ये मज्बूरियां हैं.


भीड़ में कोई ख़तरा नहीं हैं,

जान लेवा ये तन्हाइयां हैं.

                                          



मासूम बचपन के कोमल मन को क्या-क्या झेलना पड़ता,एक मार्मिक कहानी कविता रावत जी की-

उसका मन इतना व्यथित था कि वह एक नज़र भी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता था। कभी सहसा चल पड़ता कभी रूक जाता। उसके आंखों में आसूं थे किन्तु सूखे हुए। वह सहमा-सहमा बाजार की ओर भारी कदम बढ़ाता जा रहा था। उसकी आंखों में चाचा-चाची की हर दिन की मारपीट का मंजर और कानों में गाली-गलौज की कर्कश आवाज बार-बार गूंज रही थी। बाजार पहुंचकर उसने निश्चय किया कि वह शहर की ओर जाने वाली सड़क के सहारे चलता रहेगा। 

बहुत ढूंढ़ने पर मिलती हैं बाल -साहित्य पर रचनाऐं।  रेणु बाला जी की बचपन को याद करती सुन्दर रचना।  थोड़ी देर के लिए आप भी खो जायेंगे अपने बचपन की सुखद स्मृतियों  में -

अलमस्त बचपन....रेणु

झुक -सा गया गगन नीला
अनायास धरती के गोद मे -
कोई फूल सा आन खिला
फेंक दिया किताबों का झोला-- 
चलते -चलते 
ब्लॉग पढ़ते -पढ़ते कुछ शब्द टकरा जाते हैं उन पर मनन होना चाहिए अतः उनके शुद्ध -अशुद्ध रूप की चर्चा को आगे बढ़ा रहा हूँ।  ऐसा शायद भाषा पर स्थानीय प्रभाव के कारण हो रहा हो ... 

                            अशुद्ध  शब्द               शुद्ध शब्द   
                                    ना                          न 
                                 बढ़ियाँ                      बढ़िया 
                                 दुनियाँ                     दुनिया 
                                  साँझा                      साझा 
                                   सिर                        सर 
                               दिमांग                       दिमाग़ 
  मित्रों,दोस्तों,बच्चों (सम्बोधन के लिए )     मित्रो,दोस्तो ,बच्चो  

                                           अब आज्ञा दें 
                                            फिर मिलेंगे 
                                                                 रवीन्द्र सिंह यादव 
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