सादर अभिवादन
ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।
गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली,
पग-पग छहर रही हैं।
वह पुण्य-भूमि मेरी,
वह स्वर्ण-भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।
अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन-मन संवारती है।
वह धर्म भूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।
गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।
वह युद्ध-भूमि मेरी,
वह बुद्ध-भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।
-सोहनलाल द्विवेदी
और भी है... वो भी आएगा पर शैनेः शैनेः
हे बाल कृष्ण जगदीश्वर
जग पीड़ित है विश्वेश्वर
मद माया मोह सतावे
तू अपना रूप दिखा जा
तुम भाव भक्ति के भूखे
हम पापी भाव भी सूखे
पर तेरे ही हम बालक
दे दर्शन गलती भुला जा
हे कान्हा अब तो आजा...
फेसबुक की नोटिफिकेशन की टुन सीधे हथौड़े की तरह
अब उसके दिल और दिमाग पर पड़ रही थी।
हारकर काँपते हाथों से देवर को फोन मिलाया।
पता नहीं फोन उठाएगा या नहीं,
उठा भी लिया तो पता नहीं क्या-क्या सुनाएगा।पर,
वहाँ से पहली बार में फोन उठ भी गया।
हैलो की आवाज़ सुनते ही रीमा की रुलाई छुट गई।
"भाभी, आप जल्दी आ जाइए,मैं भैया के पास ही हूँ।"
कहकर फोन रख दिया था।
आँखों में आँसू लिए रीमा अपने नाज़ुक रिश्ते को संभालने निकल पड़ी।
भारत का उन्नत हो भाल,
करना है बस वही काम !
अपने बल पर जीते संग्राम
बाध्य करें हम युद्ध विराम !
रहें सीखते सब अविराम,
पीछे ना रहे एक भी ग्राम !
कहां छुपे तुम बैठ गए हो,हे गोकुल के नाथ।
आन विराजो सबके उर में,लिए तिरंगा हाथ।।
ग्वाल बाल के अंतस में दो,देश भक्ति की आग।
दिव्य रूप से नाश करो अब,सारे विषधर नाग।।
अखंडता के मूल मंत्र से, ऊँचा करना माथ।
आन विराजो सबके उर में,लिए तिरंगा हाथ।।
इस बज़्म की दिल फ़रेब हैं रस्म ओ रिवाज,
दहलीज़ पे इक शाम ए चिराग़ जलाए रखिए,
उम्रभर की वाबस्तगी थी लेकिन दोस्ती न हुई,
हाथ मिलाने का सिलसिला यूंही बनाए रखिए,
आज बस
सादर वंदन






