शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.टी.एस.दराल जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए (पाँच+एक अतिरिक्त) पसंदीदा रचनाएँ-
पर्वत तो यूं बिखर रहे, ज्यों ताश के पत्ते,
पेड़ काटकर बन रहे ,रिजॉर्ट्स बहुमंजिले।
जब पाप बढ़े जगत में, कुदरत करती न्याय,
आजकल तो सावन में, शेर भी घास ख़ाय।
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डर लगता है, गर्हित दुनिया
हम ही भीतर कहते आये,
अपने ही हाथों क़िस्मत में
दुख के जंगल बोते आये!
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अब
प्रकृति भी ज़हर उगलने लगी है..
चिड़ियों की चहकें सहमी हैं,
पेड़ लगे हैं जैसे रोने।
धरती की धड़कन डगमग सी,
लगी है फूलों की लाली खोने।
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उत्तरकाशी का धराली.. सब कुछ अपनी गोद में समेट कर ले गई मां गंगा
उत्तरकाशी का धराली बता रहा है कि चट्टानों पर बने जल प्रवाह के निशान
चेतावनी देते हैं,
'...बस यहीं तक, इसके आगे नहीं!"
सदियों से हिन्दू समाज, प्रकृति पूजक समाज
प्रकृति मां की चेतावनी को समझता आया। मर्यादा में रहा।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव



