नमस्कार
वचन दिया जो गौरी माँ को
शीश कटाया उसकी खातिर,
अहंकार तज शिव को जाना
बुद्धि हुई सुबुद्धि बन जाहिर !
वो अक्सर फूल परियों की
तरह सजकर निकलती है
मगर आँखों में इक दरिया
का जल भरकर निकलती है।
कँटीली झाड़ियाँ ष
आती हैं लोगों के चेहरों पर
ख़ुदा जाने वो
कैसे भीूड़ से
बचकर French है.
यर्त।।मैंक्षत्र
कोलाहल हृदय के
हो गए शांत ।
क्लांत चेतना ने
पाया विश्राम ।
तुम पिता मेरे
स्वरुप विशाल,
तुम्हारी गोद में
रख कर सिर
सो जाऊँ निश्चिंत ,
निर्द्वंद, निर्भय ।
मत ढूंढना मेरे शब्दों में अपने किस्से
ओर प्रेमिका तो कभी नहीं
मैं नहीं चाहता बढ़ जाए सिरफिरों की गिनती
आज बस
सादर वंदन



