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गुरुवार, 11 जुलाई 2024

4183...भेड़ को भेड़िया बनने में नहीं लगती देर...

 शीर्षक पंक्ति : आदरणीया अभिलाषा चौहान जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

गुरुवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ। 

आइए पढ़ते हैं आज की पाँच चुनिंदा रचनाएँ- 

रैन भई चहुँ ओर...

हर  किसी कर से मुक्ति हो जाएगी

दौलतमंद का नाम कर्जदार कर दो।

तरक्की दिखने लगेगी ऊंची सर्वोपरि

विनाश का नाम चमत्कार कर दो।

*****

७७४. वह महिला 

वह महिला निर्भर नहीं 

किसी पुरुष पर,

उसे नहीं चाहिए 

किसी की मंज़ूरी,

नहीं चाहिए 

किसी का सहारा,

किसी का समर्थन.  

*****

अनायास ही ..

*****

कुछ अनकही.....??

भेड़िये अब गलियों में घूमते

लगा भेड़ का मुखौटा

शिकार की तलाश में ,

गली-गली घूमते इन भेड़ियों को 

पहचान पाना है मुश्किल !

भेड़ को भेड़िया बनने में 

नहीं लगती देर

हे प्रभु कैसा हे अंधेर..!!

*****

नभ से भी दूर लगते हो

तुम सा न अपना सृष्टि में कोई ,

निशि दिन दरस की नित कामना है ।

मीरा की अविचल लगन ह्रदय में ,

शबरी सी जगी दृढ़ भावना है ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव  


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