सादर अभिवादन
आज सखी नहीं है
सूचना आई थी
सो रचनाएं देखें....
मतलब और गरज़ के रिश्ते
कोयले की तरह होते हैं,
जब गर्म होते हैं
तो छूने वाले को जला देते हैं,
और जब ठंडे होते हैं
तब हाथ काले कर देते हैं।
क्वारेन्टीन और डिस्टेंसिंग जैसे शब्द अब यक्ष हो गए,
आइसोलेशन में पति पत्नी के जुदा शयन कक्ष हो गए।
कोरोना की ऐसी तैसी, पत्नी तो इस बात से खुश है कि,
लॉकडाउन में पति और बेटा गृह कार्यों में दक्ष हो गए।
मौन में तो सदा जड़ता
बोलने में ही प्रगल्भता
खामोशी पर शोर रहता भारी सा क्यों है
सही सदा लीक, बस चिन्तन नगण्य है
करार हो भी गया तो
वो टिक न पाएगा
भला अंधेरे उजाले
का मेल क्या होगा.
तुम गईं..
जैसे रेलवे के सफर में
बिछड़ जाते हैं कुछ लोग
कभी न मिलने के लिए
आखिर कहाँ से आया 'लिट्टी-चोखा' और कैसे बन गया बिहार की पहचान....
लिट्टी चोखा का इतिहास रामायण में वर्णित है। ये संतो का भोजन होता था। जब राम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हेतु गए थे तब भी उन्हें सुबह में सातु और रात्रि में लिट्टी चोखा मिलता था।
रही बात लिट्टी चोखा की तो ये विशुद्ध रूप से भोजपुरी भाषी भोजन है और भृगु क्षेत्र (बलिया) से लेकर व्याग्रहसर (बक्सर) तक प्रचलित थी। आज भी बक्सर में पंचकोशी मेला लगता है जिसमे 05 दिन लिट्टी ही बनती है। ये भगवान राम का अनुसरण है जो यज्ञ की रक्षा के समय किया गया था।
कुछ लोगों की लापरवाही या कहिए आरामपरस्ती ने देशों के नक्शे बदल कर रख दिए ! ऐसे लोगों के कारण सियालकोट का हिन्दू बहुल इलाका भारत में शामिल होते-होते रह गया ! 1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिन्दुओं की तादाद दो लाख इक्कीस हजार थी। उस में से तकरीबन एक लाख लोगों ने वोट नहीं दिया था और पचपन हजार मतों से सियालकोट का भारत में शामिल करने का प्रस्ताव गिर गया था ! वैसे यह आदत या चरित्र अभी भी पूरी तरह बदली नहीं है..............!
चलते - चलते एक गीत सुनिए
इति
कल मिलिएगा पम्मी सखी से
सादर





