सादर अभिवादन
बहुत सारे उत्सव
भगवान झूलेलाल जयन्ती
ईद...
रामनवमी...
महावीर जन्म कल्याणक
इसी से लगा बंधा चैत्र नवरात्रि का त्योहार
और मुस्कुराइए और भंडारा पर भंडारा
का उपभोग करते चलिए
आइए देखें कुछ रचनाएं ....
लहू मे भी घुल रहा
संघर्ष की अदृश्य गोलियाँ
बन रहा पाश्चात्य फिरंगी सा
भूल गया अपनी भाषा बोलियाँ
सात छिद्र बंशी धरे
निकरे मीठे बोल ।
कष्ट से जीवन निखरे
कष्ट बड़ा अनमोल ।
औषध तो पीड़ा हरे
करे न शोध विकार
सतसंगत शोधन करे
बुरे हो लाख विचार
ठठेरा एक हिन्दू जाति है, जो परम्परागत रूप से चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी राजपूत हैं। ये लोग अपने को सहस्त्रबाहु का वंशज मानते हैं। इनके अनुसार जब परशुराम जी ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का प्रण लिया तो बहुतेरे लोगों ने अपनी पहचान छुपा, बर्तनों का व्यवसाय शुरू कर दिया। जो आज तक चला आ रहा है। कुछ लोग अपने को मध्यकालीन हैहय वंशी भी मानते हैं .!
प्रिय जो छोड़ गया शरीर
उसे जलाने के बाद
धूप में तपती सीढियां चढ़कर
जलाने होते हैं तलवे
उसकी याद को छोड़ आना होता है
सात सौ सीढ़ियों के उस पार .... ....
तब जाकर मुक्ति देती है प्रेतशिला
चर्चा
चल रही है
जारी
रहेगी बैठक
समापन की
तारीख रखी
गयी है अगले
किसी रविवार की
खलबली मची है
गिरोहों गिरोहों
बात कहीं भी
नहीं हो रही है
किसी के भी
सरदार की
आज बस. ...कल मिलिएगा सखी से
सादर वंदन




