
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
भाई पेटीकोट शासन को आसानी से स्वीकार कर लेता है....
यूँ तो 1560 से 1564 तक का जो शासन काल है
उसे पेटीकोट शासन के नाम से जाना जाता है क्योंकि
उस समय अकबर की धाय माँ महामअनगा उनका शासन में विशेष दखल था
शुरुआती दिनों में लोग मुझे पेटीकोट वाली छड़ी के रूप में जानते थे।
समय के साथ-ही-साथ मेरा रूप-रंग बदलता गया।
मेरा निर्माण मानवजाति की सेवा के लिए हुआ था।
किसी का क़द बढ़ा देना किसी के क़द को कम कहना
हमें आता नहीं ना-मोहतरम को मोहतरम कहना
चलो मिलते हैं मिल-जुल कर वतन पर जान देते हैं
बहुत आसान है कमरे में बन्देमातरम कहना।
घर-परिवार का मैल धोते हुए
कितना चीकट जम चला है
आत्मा की उजली सतह पर
जिसे संसार का कोई साबुन नहीं धो सकता
इससे बिल्कुल बेख़बर है
अलगनी पर सूखता पेटीकोट।
आदिवासी औरत पोल्का नहीं पहनती
एक चीर से ढँक लेती है शरीर
आप सर आप मेडम
आप सदियों से नहीं आए हमारे देस
आपने कहा बैठा नहीं सकता कोई दरोगा
किसीको चार दिन चार रात थाने पर
आप सर आजादी से पहले आए होगे
हमारे गाँव
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पुनः भेंट होगी...
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