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सोमवार, 12 दिसंबर 2022

3605 / "ऊ ला ला ......."

 

नमस्कार ! 

आज कल चुनाव का मौसम ऐसा रहता है कि हमेशा  यही लगता है  कि कहीं  न कहीं हम किसी को चुन ही रहे हैं ......एक  राज्य की चुनाव प्रक्रिया  ख़त्म नहीं होती  दूसरे  राज्य की तैयारी शुरू ....... और नेता लोग आपस में  एक दूसरे को किस दृष्टि से देखते हैं ये तो आपको इस लेख को  पढ़ने  पर पता चलेगा .... 

ऐसा भी कोई कुत्ता होता है??



एक हमारे कुत्ते हैं, जिस पर भौंकना चाहिये, उस पर भौंकते नहीं मगर कोई गरीब भिखारी दिखा तो गली के कोने तक भौंकते हुए खदेड़ देंगे. जो दो रोटी डाल दें, उसके घर के सामने पूरी सेवा भाव से डटे रहेंगे और उसके मन की कुंठा के पर्यायवाची बने हर गुजरती कार पर भौंक भौंक कर झपटते रहेंगे. अक्सर तो उस घर पर आने वाले परिचतों पर ही झपट पड़ेगे. 

हम किसी को कुछ नहीं कह रहे ...... सोचने का क्या है ? इंसान कुछ भी सोच सकता है ...... लेकिन लेखकों की कल्पना शक्ति किस गति से चलती है ..... इसका जायजा लीजिये इस लेख में .... 


यह अत्यंत सुखद क्षण था जब मेरी कल्पना(चावला) की आत्मा सजीव हो उठी और मैंनें अपने सहयात्री  के  साथ यान मे  प्रवेश  किया. पलायन वेग के साथ यान को वैज्ञानिकों ने उपर फेंका. पृथ्वी के वायुमंडल को चीरते हुए यान अंतरिक्ष मे कुदने को तत्पर हुआ और मैं धरती माता के मोह के गुरुत्व-बंधन से अपने को मुक्त करता हुआ मातुल लोक की ओर लपका |

इस लेख की सार्थकता यही है कि  पढ़ते हुए लगा कि लेखक के कदम चन्दा मामा  पर  पड़ ही गए हों .........  आपको भी यही लगा न कि लेखक महोदय चन्द्र यात्रा से लौटे हैं ? लेखन वो कला है जो असंभव को भी संभव बनाने की सामर्थ्य  रखती है ........ हर एक के जीवन में संघर्ष है ...... पल पल हम अपने आप से भी युद्ध करते चलते हैं ..... और एक ऐसी ही बानगी इस रचना में ...... 


निःसंदेह,
धरती तब भी खून से लाल होती है
लेकिन अभिमन्यु युगों की प्रेरणा बनता है 
न मुक्त होता है,
न होने देता है !

तो अपनी जीजिविषा का हुंकार करो
शंखनाद करो .

 और  जिजीविषा  के लिए शंख नाद की बात कर रहीं हैं ये कवयित्री  और हमारे  स्वास्थ्य   विशेषज्ञ  एक ब्लॉगर हैं  वो  सीधे बात न कर व्यंग्यात्मक तरीके से कुछ कहना चाह रहे हैं .... 

घर में पूरे दिन बैठे रहकर टीवी देखते समय मेरी स्पोर्ट्स वाच रिमाइंडर देती रहती है कि अब कम से कम खड़े ही हो जाओ भैया ? इसे फेंक ही दूँगा किसी दिन गुस्से में  !
 
अब आप गुस्सा  छोड़िये...... मन को शांत कीजिये  और  इम्युनिटी  बढ़ाइए ...... चलिए कुछ मीठा हो जाये ....... सर्दी का मौसम  और हलवे की बात ....... यूँ ही आनंद आ जायेगा .... 


मुझे तो यह रेसिपी  बहुत पसंद आई ...... एक बार कोशिश तो ज़रूर करुँगी  😅
 सर्दी भगाने  का उपाय भी हो गया और मन भी मीठा  हो गया ....... दिसंबर माह और दिसम्बर को याद न किया जाय  , ये तो हो नहीं सकता .......  दिसंबर में क्या क्या याद आ जाता है इस पर एक नज़र .... 


ओ दिसंबर ! 
जब से तुम आये हो 
उम्मीदों की ठंडी बोरसी 
अंधियारे में 
सुलग रही है |

 यहाँ तो दिसंबर का यथार्थ चित्रण हो रहा है और  हमारे ब्लॉगर साथी कल्पना की उड़ान में न जाने  कहाँ कहाँ विचरण करते हैं  ......... मन को मोह लेने वाला वर्णन  आप भी पढ़ें ... 

रूप पुष्पित पुष्प ज्यों

भृंग लट उड़ते मधुप

माधुरी लावण्य है

चाल चलती है अनुप

देख परियाँ भी लजाए

स्वर्ण काया सोहिनी।

पढ़ते हुए जैसे सारा सौन्दर्य आँखों  के सामने आ गया हो ....... वैसे सौन्दर्य की व्याख्या भी सब अलग अलग अंदाज़ में करते हैं ........ किसी को कुछ पसंद आता है तो किसी  अन्य  को कुछ और .....

विल्स ...


एक पुरानी विल्स की सिगरेट जैसी है.
ख़ाकी फ्रौक में लड़की सचमुच ऐसी है.


हंसी-ठिठोलीकूद-फाँदये मस्त-नज़र,
अस्त-व्यस्त सी लड़की देखो कैसी है.

वाह .... गज़ब ही कल्पना है ......... लड़की को सिगरेट जैसा ही बता दिया ........ वैसे सोच तो मस्त है ....... लेकिन बहुत से लोग शायद डर्टी डर्टी कह देंगे ......याद आया विद्या बालन की  मूवी  आई थी डर्टी ......... बहुत चला था तब ..... ऊ ला ला .......  आपको भी   पढ़वाते  हैं ऐसा ही कुछ ...... 



अब इस बुम्बाट रचना के बाद  समझ नहीं आ रहा कि क्या  लिखूँ  ? ....... बस आप लोग कुछ गलत मत समझ लीजियेगा ....... क्यों की बहुत बार आपको खुश करने के लिए लोग आपसे बात छुपाते हैं उनका इरादा झूठ बोलने का होता नहीं है ......  इसी बात को एक लघु कथा में पढ़िए ....



"अरे मम्मी रुको ! ऐसा मत सोचो (कहकर निधि हाथ जोड़कर बोली "सॉरी पापाजी ! आज आपसे किया प्रॉमिस तोड़ रही हूँ,बहुत बहुत सॉरी ! पर आज ये प्रॉमिस नहीं तोड़ा न, तो यहाँ सास-बहू के रिश्ते में मनमुटाव बढ़ता ही जायेगा , मुझे माफ करना पापाजी" ! )  फिर बोली  "मम्मी ! ना तो दुकानदार ने उन्हें ठगा है और ना ही भाभी  झूठ बोल रही,  झूठ तो आपसे पापाजी कहा करते थे" ।

अच्छा हुआ जो ग़लतफ़हमी जल्दी ही दूर हो गयी  और रिश्तों की गरिमा बची रह गयी ....... यूँ तो बचाने को हमें बहुत कुछ बचाना चाहिए ........ लेकिन कहाँ कर पाते हैं ....... गाँव ख़त्म होते जा रहे हैं और शहर के   ड्राइंग रूम  में  हम  गाँव  बसाने का प्रयत्न  करते हैं ......

फूलदान में सजते गाँव


एक तलैया चर-चर नाव
कब्जा किया जमाया पाँव ।
जलकुंभी के फूल सजे हैं
फूलदान में  सजते गाँव ॥
बगुला-बतखें दूर उड़ गए
झटका देकर तगड़ा ॥

अंत में  ईश्वर को याद करते हुए  आज की  इस  हलचल  को विराम देती हूँ  ----


तीनों लोक हुए बलिहारी,

देख छवि वो न्यारी।

ध्यान लगा के ऐसे बैठे,

सुध न रही हमारी।

पत्ता-पत्ता देख रहा है,

लीला राधा-श्याम।


 एक सप्ताह बाद फिर मुलाकात होगी ........ 

नमस्कार 

संगीता स्वरुप . 






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