सादर अभिवादन .....
मित्रों मुझे कल रात 11:00 बजे हार्ट अटैक आ गया था
इसलिए मैं हॉस्पिटलाइज्ड हूं
भाई श्री रूपचंद्र जी शास्त्री को हौसला देते हुए
ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ वे शीघ्रातिशीघ्र स्वस्थ हों
गेट वेल सून
अब रचनाएँ ....
उस युग में गोविन्द
दूर रह कर भी
द्रौपदी की आर्त पुकार को
सुन कर विचलित हुए थे
और उन्होंने चीर बढ़ा कर
द्रौपदी की लाज बचा ली थी !
आज देखा मैंनें तुम्हें
जब तुम शीशे के सामने बैठी
अपने बालों को
सुलझाने की कोशिश कर रही थी
और फिर अचानक ही तुम
वहाँ उसे उठकर गयी
समय का सिंगारदान
काला हो चला है
सूख रही है मेरे कलम की स्याही
लिखने की मेज पर पड़ा
कप का निशान मिटता ही नहीं
तुम बनकर गीत सरस , सुन्दर
बस वचन मधुर कहते रहना
सबके मन में बन प्रीत अमर
रसधारा से बहते रहना
कलियाँ खिल जाएँ उमंगों की
खुशियाँ ही खुशियाँ बरसाना ।
तेरी हर बात पे रश्क होता
दिल हमारा तेरे लिए ही रोता
श्वेत हिम ढकी चोटियाँ हिमालय की
या सर्द अमरनाथ की गुफाएं
सुदूर समंदरों का किनारा हो
किसी घनघोर जंगल की हवाएं
तेरी ख़ुशबू हर तरफ़ इक सी फैली
तेरी नेमत इक जैसी मिली !
ठाढे हैं सकल नर नारी,
त्रिपुरारी रहे निहारी ।
बर माँगे है सीस नवा रे,
मस्तक पर गंगा धारे ॥
माँ हंसी,माँ मुस्कुराई,सर पे मेरे हाथ भी फेरा,
बोली-ये जग,ये घर,न किसी का,न तेरा,न मेरा,
धरणी है नारी,केंद्र है रिश्तों,परिवार,जहांन का,
मुसाफिर हैं सब यहाँ,और ये दुनिया रैन बसेरा।
आज बस
सादर







