सादर अभिवादन.....
अंतिम रविवार माह जून का
जातिगत आरोप-प्रत्यारोप
बदस्तूर जारी है.....और
जारी भी रहना चाहिए..
आम जनता उसी में उलझी रहती है
कुछ दिनों पहले पढ़ी थी कुछ
असहिष्णु लोग तुर्की मे
जमीन-जायदाद खरीद रहे हैं...और
कुछ दुबई में..
अब वहां से राजनीतियों का
दौर चालू हो जाएगा...अस्तु
रचनाएँ देखें.....
जो करते हैं दगा-फरेबी,
वो पाते हैं दूध-जलेबी,
सच्चाई के सारे गहने,
महफिल में नीलाम हो गये।
जो मक्कारी में अव्वल थे,
वे सारे सरनाम हो गये।।
भाई ने बताया
नेता अपनी पार्टी के प्रति ही वफादार नहीं होते
और हम उन पर भरोसा करके
उनके हाथों में देश और राज्य दे देते।
अब क्या कहें
राजनीत वाले केवल
अपने तोंद के प्रति वफादार होते हैं
उसका कहना था वो अमेरिकी सेना में कमांडर हैं और भारत में अध्ययन के लिए दो साल के लिए यहाँ आया हैं | आपको इतने पर ही हँसी आ रही होगी | फिर पता चला उसके साथ उसकी पत्नी और दो बेटे भी साथ आये थे भारत और सोचिये रहते कहाँ थे वो, होटल ताज वो भी कोलाबा गेटवे वाले ताज में |
बहुत बाद के बाद
वात से वार्ता करता मैं
नील नदी के स्वप्न में
तड़क कर उठता
चल देता
तुम्हारी ओर
ख़तो-क़िताबत चलन से बाहर
फ़िज़ाएं चैटिंग में ढल रही हैं।
जिसे भी देखो हुआ सियासी
हवाएं कैसी ये चल रही हैं
तू लाख मना, अब मुझको
पक्की कट्टी, मेरी तरफ से
ज़ख़्म मैंने दिया है तो फिर
मलहम पट्टी, मेरी तरफ़ से
आज बस
सादर





