सादर अभिवादन.
गुरुवारीय अंक के साथ हाज़िर हूँ.
आज की पाँच रचनाएँ-
हो रात भी घनेरी अरि घात हो लगाए।
जयघोष भारती का सुनकर सदा डरेंगे॥
माता धरा हमारी हम प्राण वार देंगे।
तन से लहू बहे पर हम वार भी करेंगे॥
दोनों मे प्यार हो गया। बहुत प्यार करते थे दोनों एक दूसरे से। उन्मुक्त गगन में विचरने वाले को पिंजरा कतई रास ना आता और पिंजरे में रहने वाली ने तो अब अपना घर ही बसा लिया था...
नशा है ,नाश का घर,
रुलाती है जीवन भर।
सभी को कंगाल कर,
लेती धन-प्राण को हर।
धन-प्राण ना अब हरने दो।
न बेमौत मरो, ना मरने दो।
अगर आप भूल गए हो हँसना भी,
भले ही न याद हो
आप कभी हँसे थे खुलकर भी,
पथरायी आँखें भूल गईं हों चमकना,
और दिल में सुलगता हो शोला भी,
पर हुजूर मुस्कुराना ज़रूरी है।
भले ही न याद हो
आप कभी हँसे थे खुलकर भी,
पथरायी आँखें भूल गईं हों चमकना,
और दिल में सुलगता हो शोला भी,
पर हुजूर मुस्कुराना ज़रूरी है।
बात उन दिनों की है जब आज से चार साल पहले मैं पहली बार मुंबई आयी थी। मुझे आए हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था। मायानगरी की अदाओं से मैं अभी बिल्कुल अनजान थी, इसके मिजाज के बारे में थोड़ा बहुत सुना पढ़ा तो था मगर अनुभव के नाम पर सब जीरो था। ना रास्तों का ढंग से पता था ना ही बाजार-हाट का, ना ही किसी व्यक्ति विशेष से परिचय था। पहचान के नाम पर हमारी एक बुजुर्ग हाउस ऑनर थी जो मराठी थी ना उनकी कोई बात मेरी समझ में आई ना ही मेरी कोई बात उनके पल्ले पड़ती बस, दुआ सलाम तक ही बातें होती थी।
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आज के लिए बस इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में-
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