शीर्षक पंक्ति: आदरणीय विकास नैनवाल जी की रचना से।
सादर अभिवादन
सोमवारीय अंक लेकर हाज़िर हूँ।
आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
दहशतजदा दीवारों में
जंग लगी
खिड़कियों को बंद कर
देखना पड़ता है
छत की तरफ़
नींद में चौंककर
रोना पड़ता है
बच्चों की तरह
ईंट की दीवारों की जगह
मन-मस्तिष्क की दीवारों पे,
काश ! .. कुछ इस तरह
हो पाते अंकित ये नारे
"स्वच्छ भारत अभियान" के।
अपरिमित ध्रुवों को समेटे
विस्तार धारे अपने अंक में
क्या कुछ नहीं गर्भ में भरा
जगत आधारी है ॥
धारी दिनकर सिंह का, लेखन कार्य महान।
अलख क्रांति की नित जगा, रखा देश का मान।।
रखा देश का मान, खरी खोटी थे कहते।
रहे सदा निर्भीक, झूठ को कभी न सहते ।।
नाटकों के पात्र हैं हम सब,
नही किसी पात्र के दर्शक,
हमारा कर्म है अभिनय,
हमारा धर्म है अभिनय,
हमारे कर्म का,सत्कर्म का,
कभी लड़े-झगड़े, कभी साथ मुस्कराये हम
न जाने कब एक दूसरे की मंजिल
हो गए
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