नमस्कार
सुप्रभात
सादर प्रणाम
whatsapp से
एक बार एक चीते और गधे में बहस हो गई। चीता बोला आसमान का रंग नीला और गधा बोला काला।
दोनों शेर बादशाह के दरबार में पहुँचे। शेर ने बहस सुन कर चीते की जेल में डालने का हुक्म दिया। चीता गिड़गिड़ाया की मैं सही हूँ और मुझे ही सज़ा क्यों मिल रही है?
Now the verdict is classic and involves a lot of learning.
शेर बोला की मैं जानता हूँ की तुम सही हो पर तुम्हें सज़ा इसलिए मिल रही है की तुमने गधे से बहस ही क्यों की!!!!
प्रस्तुत है आज की हलचल
बहकने लगे यूँ
उनके हर ख़त पे महकने लगे यूँ
वो आस-पास हो चहकने लगे यूँ
खुशबू फूलों की थी उस खत में या मुहब्बत की
शाखे आर्जू झुकने लगे यूँ
वो आस पास हो चहकने लगे यूँ
उनके हर ख़त पे महकने लगे यूँ
वो आस-पास हो चहकने लगे यूँ
खुशबू फूलों की थी उस खत में या मुहब्बत की
शाखे आर्जू झुकने लगे यूँ
वो आस पास हो चहकने लगे यूँ
मुआमला दिल का था संजीदा
इधर भी उधर भी
तस्वीर दिल में थी उनकी इसकदर बसी हुई
उनके होंठों के जाम लब पे मेरे
छलकने लगे यूँ
वो आस-पास हो चहकने लगे यूँ
इधर भी उधर भी
तस्वीर दिल में थी उनकी इसकदर बसी हुई
उनके होंठों के जाम लब पे मेरे
छलकने लगे यूँ
वो आस-पास हो चहकने लगे यूँ
मुफ्त बाँटने वाली चुस्त सरकार...
जिस प्रकार घर के प्रत्येक सदस्य का अपने घर-परिवार के प्रति कोई न कोई कर्तव्य होता है और हर सदस्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी जिम्मेदारी से करता है, उसी प्रकार समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करे तो शायद हमें यह कहने की आवश्यकता ही न पड़े कि सरकार कुछ नहीं करती। हम ये नहीं कहते कि सरकारें हमेशा सही ही करती हैं यदि ऐसा होता तो कोई परेशानी ही क्यों होती परंतु क्या अपने कर्तव्यों का बोझ भी सरकार पर डाल कर सिर्फ कमियाँ गिनवाने के लिए खड़े हो जाना ही हमारा काम है? या यही समस्याओं का हल है.....मैं समझती हूँ कि नहीं।
जिस प्रकार घर के प्रत्येक सदस्य का अपने घर-परिवार के प्रति कोई न कोई कर्तव्य होता है और हर सदस्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी जिम्मेदारी से करता है, उसी प्रकार समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करे तो शायद हमें यह कहने की आवश्यकता ही न पड़े कि सरकार कुछ नहीं करती। हम ये नहीं कहते कि सरकारें हमेशा सही ही करती हैं यदि ऐसा होता तो कोई परेशानी ही क्यों होती परंतु क्या अपने कर्तव्यों का बोझ भी सरकार पर डाल कर सिर्फ कमियाँ गिनवाने के लिए खड़े हो जाना ही हमारा काम है? या यही समस्याओं का हल है.....मैं समझती हूँ कि नहीं।
उछलकूदिया न बनें इधर रहें या उधर
हम सभी चाहते हैं कि हम जो कुछ पाना चाहते हैं वह प्राप्त करने में कोई अड़चन न आए और सहजता से प्राप्त हो जाए। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि हम लाभ-हानि के अनुरूप अपनी भूमिकाएं रंगमंचीय पात्रों या बहुरूपियों की तरह बदलते रहें, चाहे जिसके पीछे-पीछे चलने लगें, अनुकरण करते रहें और उन सारे कामों में रस लेने लगे जिनसे हमारे स्वार्थ सधते हैं।
गम के आँसू
ग़म के हों या ख़ुशी के हों आंसू
वैसे तो एक जैसे होते हैं,
पर न जाने मुझे
ऐसा क्यों महसूस होता है
कि जो आंसू ग़म में निकलते हैं,
उनमें नमक थोड़ा ज़्यादा होता है.
वृद्धाश्रम मे छोड दिया
कैसी ये आपा धापी से मानव ने खुद को जोड़ लिया
इस कलयुग के बेटे ने जिंदगी का यो आगाज किया
बूढी आँखे बहते आँसू सब कुछ नजर अंदाज किया
इस कलयुग के बेटे ने
कैसे जियेंगे तुझ बिन हमको इतना तो समझा देते
अच्छा होता वृद्धाश्रम के बदले शमशान पहुंचा देते
कैसी ये आपा धापी से मानव ने खुद को जोड़ लिया
इस कलयुग के बेटे ने जिंदगी का यो आगाज किया
बूढी आँखे बहते आँसू सब कुछ नजर अंदाज किया
इस कलयुग के बेटे ने
कैसे जियेंगे तुझ बिन हमको इतना तो समझा देते
अच्छा होता वृद्धाश्रम के बदले शमशान पहुंचा देते
दिजिए आज्ञा
धन्यवाद
विराम सिंह सुरावा
