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शनिवार, 27 नवंबर 2021

3225... अभिविन्यास

      हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

"अद्धभुत, अप्रतिम रचना।

नपे तुले शब्दों में सामयिक लाजवाब रचना। दशकों पहले लिखी यह आज भी प्रासंगिक है। परिस्थितियाँ आज भी ऐसी ही हैं।

लाज़वाब.. एक कड़वी हकीकत को बयां करती सुंदर रचना।

रचना में अनकहा कितना सशक्त है। मार्मिक व सच्चाई को उजागर करती उम्दा रचना।

सशक्त, गजब, बेहतरीन, बहुत शुक्रिया, इस रचना को पढ़वाने का हृदय से आभार.. 

जैसे आदि-इत्यादि टिप्पणियों के बीच में कोई भी विधा की रचना हो तुम्हारे भाँति-भाँति के सवाल, तुम्हें ख़ुद में अटपटे नहीं लगते?"

"नहीं ! बिलकुल नहीं.. अध्येता हूँ। मेरा पूरा ध्यान विधा निर्देशानुसार अभिविन्यास पर रहता है। और करना भी तो पड़ता है"

खुद से गुफ्तगू

कुछ तो है ऐसा जो अन्दर चुभ रहा है पर दिख नहीं रहा।टीस तो उठ रही है पर वजह क्या है समझ नहीं आ रही।एक सन्नाटा सा मन में है।क्या कहें उसे सन्नाटा,निशब्द,शून्य या फिर कुछ और? बस इतना पता है कि कुछ तो मर गया है अन्दर, निशास्वत होगया है। कितना भी उठाओ झिंझोड़ो मन है कि पहले सा दौड़ता नहीं है।

तुम पर कविता लिखना

खूब हुई है कहासुनी ... 

  इसबार सुन लूं 'अनकही '...|

ताकि जान सकूं 'ना ' में छुपी 'हाँ' को ,

गुस्से में दबे प्यार को ,

और खुद्दारी में समाई प्यास को ......

एक अप्रत्याशित कवि

ईश्वर की वो सुंदर रचना है

गर भक्ति मार्ग प्रस्थ करे

तो लौकिक होते हुए भी

पारलौकिकता

का अनुभव बोध करा सकती है

पराई जीभ

एक प्रतीक्षित मृत्यु स्वयं के साथ न जाने कितने जीवित लोगों को मुक्त कर देती है–-यह विचार उस कुहासी मौसम में उसे अधिक ठंडी झुरझुरी दे गया।

 अन्तेयष्टि के बाद निकटतम परिचित लोग परिवार जनों से मिलकर अपने घरों को जा रहे थे।भीड़ के एक छोर पर वह खड़ा था।

मन रे अब मीठा मत खाना

मीठी-मीठी बात किसी की

फ़ौरन ठग लेती है

मीठी छुरियो ने हरदम

गर्दन तेरी रेती है

मीठा विष भी होता है

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 3 जून 2016

322....भारतीयता और पाश्चात्य के अंतर को समझ पाना असंभव हो गया है

जय मां हाटेशवरी...

जूनागढ़ का पतन हो रहा था। राजा वीरता से युद्ध करते हुए रणक्षेत्र में सो चुके थे। महल में हाहाकार मच रहा था, किन्तू फिर भी पट्टन की सेनाएं दुर्ग को घेरे हुए थीं। सेना अंदर घुसकर राजा के पुत्र युवराज नौघड़ को पकड़कर मार डालना चाहती थी।

राजमंत्री ने दुर्ग का गुप्त द्वार खोला और रानी को राजकुमार के साथ बाहर निकाल दिया। रात्रि के घने अंधकार में अपने पुत्र को शत्रु के सैनिकों की आंखों से बचाती हुई रानी एक गरीब अहीर के द्वार पर खड़ी थी। उसका नाम देवायत था।
‘मुझे पहचानते हो भैया!’ रानी ने गृहपति से पूछा।
‘अपनी रानी माता को कौन नहीं पहचानेगा?’देवायत ने उत्तर दिया।
‘और इसे?’ रानी ने नौघड़ की ओर संकेत करते हुए देवायत से प्रश्न किया।
‘हां-हां क्यों नहीं?’ युवराज हैं न। कहिए, कैसे आगमन हुआ मेरी झोंपड़ी में? क्या आज्ञा है मेरे लिए? उसने हाथ जोड़कर प्रश्न किया।
‘हम तुम्हारी शरण में आए हैं भैया!’ रानी ने उत्तर दिया, ‘यह तो तुम्हें मालूम ही होगा कि जूनागढ़ का पतन हो चुका है और तुम्हारे महाराज मारे जा चुके हैं। अब शत्रु तुम्हारे इस युवराज की जान के ग्राहक हैं, वे इसकी खोज में हैं।’
‘आप चिंता न करें रानी माता!’ देवायत ने कहा, ‘अंदर आइए। मेरे घर में जो भी रूखा-सूखा है, वह सब कुछ आपका दिया हुआ ही तो है।’
देवायत ने रानी को अपने घर में आश्रय दिया। वह जानता था कि जूनागढ़ पर शत्रुओं का अधिकार हो चुका है और इसलिए राजवंश के किसी भी व्यक्ति का पक्ष लेना उसके लिए महान संकट का कारण बन सकता है, किन्तु वह राजपूत था और शरणागत के प्रति राजपूत के कर्तव्य को निभाना भी जानता था, और यही कारण था कि वह पहले रानी और युवराज को खिलाकर स्वयं पीछे खाता और उन्हें शैय्या पर सुलाकर स्वयं धरती पर सोता। पर बात कब तक छिपती। आखिर शत्रु को अपने गुप्तचरों द्वारा पता लग ही गया कि जूनागढ़ की रानी और उनका पुत्र देवायत के घर में मेहमान हैं। अगले ही दिन पट्टन की सेनाओं ने देवायत के मकान को घेर लिया।
‘देवायत!’ सेनापति ने कड़ककर पूछा, ‘कहां है राजकुमार नौघड़?’
‘मुझे क्या पता अन्नदाता!’ देवायत ने हाथ जोड़कर नम्रता से उत्तर दिया।
‘झूठ न बोलो देवायत!’ सेनापति ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘नहीं तो कोड़ों की मार से शरीर की चमड़ी उधेड़ दी जाएगी।’
‘जो चाहे करो मालिक!’ देवायत ने उत्तर दिया,’ तुम्हारी इच्छा क्या है?’
‘अच्छा।’ सेनापति ने अपने सैनिकों की ओर देखते हुए कहा, ‘इसे बांध दो इस पेड़ से और देखो की घर में कौन-कौन हैं?’
देवायत को पेड़ से बांध दिया गया। सैनिक घर में घुसकर उसकी तलाशी लेने को तैयार होने लगे।
‘अब क्या होगा?’ देवायत मन ही मन सोचने लगा,’सामने ही तो बैठे हैं राजकुमार। कैसे बच पाएंगे वे इन यमदूतों के हाथों से।’
और दूसरे ही क्षण उसने एक मार्ग खोज लिया।
‘ठहरो।’ वह पेड़ से बंधा बंधा ही चिल्ला उठा, ‘ मैं ही बुलवाए देता हूं राजकुमार को।’
घर में घुसने वालों के कदम रुक गए। देवायत ने पत्नी को पास बुलाया और उसे संकेत से कुछ समझाया और फिर बोला, ‘जा, देख क्या रही है? नौघड़ को लाकर सेनापति के सामने खड़ा कर दे।’ पत्नी अंदर गई। नौघड़ और उसका पुत्र घर में एक साथ खेल रहे थे। उसने अपने पुत्र को उठाया,’ उसे छाती से लगाया, उसका मुख चूमा, उसे कुछ समझाया और फिर नौघड़ के वस्त्र पहनाकर वह सेनापति के सामने उसे बाहर ले आई।
‘क्या नाम है तुम्हारा?’ सेनापति ने पूछा। ‘ नौघड़।’ अहीर के पुत्र ने निर्भयता के साथ उत्तर दिया। और दूसरे ही क्षण सेनापति की तलवार से उसका सिर कटकर पृथ्वी पर जा गिरा।
शत्रु की सेनाएं देवायत को वृक्ष से खोलकर लौट गईं तो तब तक अपने आंसुओं को अपने नयनों में दबाए हुए अहीर दंपति बिलख उठे। रानी भी बाहर निकली और नौघड़ भी, किंतु वहां उन्होंने जो कुछ भी देखा उसे देखकर वे सबकुछ समझ गए।
‘यह तुमने क्या किया भैया!’ रानी चीख उठी।
‘वही, जो मुझे करना चाहिए था रानी माता! देवायत ने रोते हुए उत्तर दिया, मैं गरीब हूं तो क्या, हूं तो राजपूत ही।’ शरणागत के लिए बलिदान की ऐसी गाथाएं भारत के इतिहास की अपनी एक विशेषता है।

अब पेश है मेरी पसंद के चयनित लिंक....

लड़की दो कविताएँ....डॉ.
ऋतु त्यागी
s1600/02-06-Dharohar
लड़की
तुम्हारे लबों पर बैठी
ख़ामोशी चाबी है
घर की ख़ुशी की
जिससे खुल जाता है
ख़ुशी का कोई भी दरवाज़ा
पर
उस दरवाज़े के भीतर से
झाँकते तुम्हारे चेहरे पर
पड़ गईं हैं
दर्द की कभी न
मिटने वाली दरारें।

सर्पदंश से मौतें! कितने जागरूक हैं आप?
 बिना विलम्ब के इमरजेंसी सेवाओं के अधीन एम्बुलेंस सेवा पर काल करें। जैसे उत्तर प्रदेश में १०८ नंबर डायल करें।  सांप  काटने के मरीज को बिना विलम्ब विकास खण्ड के प्राथमिक चिकित्सालयों पर ले जायँ अथवा सीधे जिला अस्पताल जो सुगम हो और निकट हो।  वहां एक कुशल डॉक्टर मरीज की  दशा को समझ कर उपचार आरम्भ करेगें! आप एक जागरूक नागरिक के रूप में जब भी प्राइमरी हॉस्पिटल या जिला चिकत्सालय जायँ ऐंटीवेनम की मौजूदगी को जरूर सुनिश्चित कराएं। आपकी यह जागरूकता किसी को जीवन प्रदान कर सकती है ,मौत के मुंह से बचा सकती है!


भारतीयता और पाश्चात्य के अंतर को समझ पाना असंभव हो गया है
परफ्यूम , डीयो , पेस्ट , बनियान , अंडरवियर की बड़ी कम्पनी का नाम बता कर , अश्लील विज्ञापन दिखा उसके जरिये लड़की पट जाने की बात बता कर कर संस्कारों को मटियामेट किया जा रहा है | फूहड़ फिल्मे और बेहूदा गाने , संस्कृति का अपमान करते गाने देख कर गुनगुना कर हमने फिल्मकारों को आज माँ भारती पर अपमान जनक गाना गाने की इजाजत भी दे डाली है |

मुश्किल है बहुत अच्छी भली आँखों के अंधों का कोई करे तो क्या करे
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घोड़े दबाने के
शौक रखने वाले
बड़े शौक से
बनाते हैं
आदमी
को बंदूक
घर से लेकर
गली मोहल्ले
और शहर में
घोड़े हर जगह
चार टाँग और
एक पूँछ वाले
मिलें ये भी
कौन सा
जरूरी है

किन्तु नारि पे नारि, स्वयं ही पड़ती भारी
नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज ।
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज ।
नारि सुशोभित आज, सुरक्षा करना जाने ।
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।

बिहार में बंद मधुशाला (हास्य )
अब दिल ने धड़कना सा छोड़  दिया 
जब तक ये मधु न पीया तो क्या पीया
बिना सुरा अब मुंह में नहीं जाता निवाला
बिहार में क्यों बंद की मधुशाला          
धर्म, जाति  के  ऊपर  था  भाईचारा
जो ज़ाम पिलाता वो था प्राण प्यारा
प्रेम के इस भाव से खुश था ऊपरवाला 
बिहार में क्यों बंद की मधुशाला          
खुशनुमा चेहरों का नूर अब खो  गया
इतने अच्छे बिहार को ये क्या हो गया
बीते दिन लौटेंगे ये सपना सबने है पाला
बिहार में फिर शुरू  होगी  मधुशाला


आज बस इतना ही...
मिलते रहेंगे...
धन्यवाद।











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