शीर्षक पंक्ति : आदरणीया डॉ.शरद सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
मेरी अनुपस्थिति में कल की ताबड़तोड़ प्रस्तुति लेकर आई थीं
आदरणीया यशोदा बहन जी। आज शुक्रवारीय अंक लेकर मैं हाज़िर हूँ।
लीजिए प्रस्तुत हैं कुछ चुनिंदा रचनाएँ-
महल-दुमहले कैसे बनते,
अल्पज्ञ, अज्ञानी यदि न हो
गुरुजनों को कौन पूछते !
पर बेख्याली मे भी ख्याल आता है।
मैं खुद को लिखता हूँ रोज हर्फ़ - हर्फ़,
वो एक झटके मे मिटा जाता है।
एक दिन जब मैंने उसके दोस्तों को उसे कहते सुना कि "अरे विनीत ! तू बड़ा होकर विकलांग सर्टिफिकेट बना देना आजकल विकलांगों को नौकरी जल्दी मिल जाती है तो सुनकर मुझे कैसा लगा , कितना दुख हुआ ये बताने के लिए आज भी शब्द नहीं हैं मेरे पास।
मुझे आज भी हर दीपावली पर वह बच्चा याद आता है और साथ ही उसका आर्मी ज्वाइन करने का वह सपना भी।
गुलसितां में ज़र्द हर पत्ता हुआ।
चलते-चलते उत्तर-पूर्वी भारत के विशिष्ट त्योहार 'छठ पर्व' की झलकी

