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गुरुवार, 4 नवंबर 2021

3202...रोशनी खुद की बनाने में मरा आदमी...

शीर्षक पंक्ति :डॉ. सुशील कुमार जोशी जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

दीवाली महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

यह पर्व है उजास का 

उमंग और हुलास का, 

जलाऊँगा मैं भी दीया

ख़ुशियों संग विश्वास का।

-रवीन्द्र सिंह यादव   

गुरुवारीय अंक में पढ़िए कुछ चुनिंदा रचनाएँ-

दिया एक जलाता है दीपावली भी मनाता है रोशनी की बात सबसे ज्यादा किया करता है रोशनी खुद की बनाने में मरा आदमीदिया एक जलाता है दीपावली भी मनाता है


दिया एक जलाता है दीपावली भी मनाता है
रोशनी की बात सबसे ज्यादा किया करता है
रोशनी खुद की बनाने में मरा आदमी

दीपावली [ हाइकु ]


दीपक ज्योति~

तम दूर भगाए

राग द्वेष का 

आयी दिवाली

अंधकार को हम अब दूर भगाएं।

घरघर में बस प्रकाश फैलाएं।

नव उजास को भरकर जीवन में-

सबके मन का तम को हर जाएं।

नए कलेवर में एक प्राचीन कथा

अरेतू तो मेरा भी उस्ताद है !

चमचागिरी के मैदान में मैंने भी झंडे गाड़े थे लेकिन मेरे पास  तो तेरे जैसी मोटी चमड़ी थी और  ही तेरे जैसी झूठ और मक्कारी से भरी शीरीं ज़ुबान !

एक  एक दिन तू भी मेरी ही तरह चमचागिरी की सीढ़ी पर चढ़ कर हाकिमे-वक़्त बनेगा !’


1151-रिश्ते

कुछ रिश्ते बेशर्त होते हैं

बिना किसी अपेक्षा के जीते हैं

जी चाहता है अपने जीवन की सारी शर्तें

उन पर निछावर कर दूँ

जब तक जिऊँ बेशर्त रिश्ते निभाऊँ

 *****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरुवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


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