नमस्कार
छठ
बहुत बड़ा उत्सव
मना लिया गया
इस उत्सव के सामने
सारे उत्सव फेल हो जाते हैं
भाई कुलदीप जी बाहर हैं आज..
हमारी पसंद....
भाई कुलदीप जी बाहर हैं आज..
हमारी पसंद....
विरक्त नज़रों से देखता है बहते
हुए अंतरिक्ष को, वो बांध
चुका है, अपने पांवों
में अमर प्रणय
का लौह -
स्तूप,
उसने नहीं चाहा था देखना मेरा -
अंतर्मुखी रूप।
यादे छुक छुक रेल रही , यादे नैरोगेज
यादो में है कैद रही , बाबू जी की मेज
यादो में चल चित्र रहे , याद रहे कुछ मित्र
यादो में है महक रहे, खुशबू चन्दन इत्र
जब तू ही मेरे दिल में
ढूँढ रहा हूँ मैं
फिर किस को महफ़िल में ?
मुझे कुछ बात कहनी थी
लेकिन मन कहीं ठहरे तो कहूँ
मुझे कुछ काम करने थे
लेकिन मन कहीं रुके तो करूँ
एक बूंद ही प्रेम अमी की
जीवन को रसमय कर देती,
एक दृष्टि आत्मीयता की
अंतस को सुख से भर देती !
...
बस आज इतना ही
सादर
...
बस आज इतना ही
सादर




