ये नज़र है कि कोई मौसम है
ये सबा है कि वबाल आया है
हम ने सोचा था जवाब आएगा
एक बेहूदा सवाल आया है
-दुष्यन्त कुमार
मैं दिव्या एक अस्थाई चर्चाकार
मेरी परमप्रिय दीदी श्वेता जी की जगह तो नहीं ले सकती मैं
दीदी का निर्जल उपवास न होता तो मैं कभी नहीं आती
ये सबा है कि वबाल आया है
हम ने सोचा था जवाब आएगा
एक बेहूदा सवाल आया है
-दुष्यन्त कुमार
मैं दिव्या एक अस्थाई चर्चाकार
मेरी परमप्रिय दीदी श्वेता जी की जगह तो नहीं ले सकती मैं
दीदी का निर्जल उपवास न होता तो मैं कभी नहीं आती
किसी भी हाल में...
आए यहाँ रचना तलाशने...
मानो दीदी नहीं है, हम नहीं लिखेंगे
कहकर हड़ताल पर चले गए
सारे रचनाकार....किंकर्तव्यविमूढ़ हम करें भी तो क्या
सोचे हम आज यही दीदी को ही रख देते हैं....
सारे रचनाकार....किंकर्तव्यविमूढ़ हम करें भी तो क्या
सोचे हम आज यही दीदी को ही रख देते हैं....
चलिए मिलवाती हूँ दीदी से...
मेरी खुश मिजाज दीदी
सभी किस्म की रचना लिखती है..
रचनाएँ चुनने सोच-समझ कर
सभी विषयों को छूने की कोशिश की है
वह उदास औरत ....

इष्टदेव के समक्ष
डबडबायी आँखों से
निर्निमेष ताकती
अधजली माचिस की तीलियों
बुझी बातियों से खेलती
बेध्यानी में,
मंत्रहीन,निःशब्द
मैं रहूँ न रहूँ ...

फूलेंगे हरसिंगार
प्रकृति करेगी नित नये श्रृंगार
सूरज जोगी बनेगा
ओढ़ बादल डोलेगा द्वार द्वार
झाँकेगी भोर आसमाँ की खिड़की से
किरणें धरा को प्यार से चूमेगी
शरद का स्वागत ...

शरद के
स्वागत में
वादियों के
दामन
सजने लगे,
बहकी
हवाओं ने
हर शय में
नया राग
जगाया है।
सुरमई अंजन लगा ...

सेज तारों की सजाकर
चाँद बैठा पाश में,
सोमघट ताके नयन भी
निसृत सुधा की आस में,
अधरपट कलियों ने खोले,
मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा।
समानता ...

देह के बंदीगृह से
स्वतंत्र होने को
छटपटाती आत्मा
स्त्री-पुरुष के भेद
मिटाकर ही
पा सकेगी
ब्रह्म और जीव
की सही परिभाषा।
अच्छा नहीं लगता ...

झलक खुशियों की देखी है वक़्त की पहरेदारी में
याद में ज़ख़्म का हलना हमें अच्छा नहीं लगता
कहो दामन बिछा दूँ मैं तेरी राहों के कंकर पर
ज़मीं पर चाँद का चलना हमें अच्छा नहीं लगता
क्या तुम नहीं डरते? ...

सुनो ओ!जंगल के दावेदारों
विकास के नाम पर
लालच और स्वार्थ की कुल्हाड़ी लिए
तुम्हारी जड़ को
धीरे-धीरे बंजर करते,
तुम्हारी आँखों में सपने भरकर
संपदा से भरी भूमि को
कंक्रीट में बदलते,
.....
दीदी के मनोभाव
प्रकृति से मौन संवाद,
अंतर्मन की चेतना
का स्वर शब्दांकन
ही कविता है।
आभार दीदी
अनुजा
दिव्या...
मेरी खुश मिजाज दीदी
सभी किस्म की रचना लिखती है..
रचनाएँ चुनने सोच-समझ कर
सभी विषयों को छूने की कोशिश की है
वह उदास औरत ....

इष्टदेव के समक्ष
डबडबायी आँखों से
निर्निमेष ताकती
अधजली माचिस की तीलियों
बुझी बातियों से खेलती
बेध्यानी में,
मंत्रहीन,निःशब्द
मैं रहूँ न रहूँ ...

फूलेंगे हरसिंगार
प्रकृति करेगी नित नये श्रृंगार
सूरज जोगी बनेगा
ओढ़ बादल डोलेगा द्वार द्वार
झाँकेगी भोर आसमाँ की खिड़की से
किरणें धरा को प्यार से चूमेगी
शरद का स्वागत ...

शरद के
स्वागत में
वादियों के
दामन
सजने लगे,
बहकी
हवाओं ने
हर शय में
नया राग
जगाया है।
सुरमई अंजन लगा ...

सेज तारों की सजाकर
चाँद बैठा पाश में,
सोमघट ताके नयन भी
निसृत सुधा की आस में,
अधरपट कलियों ने खोले,
मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा।
समानता ...

देह के बंदीगृह से
स्वतंत्र होने को
छटपटाती आत्मा
स्त्री-पुरुष के भेद
मिटाकर ही
पा सकेगी
ब्रह्म और जीव
की सही परिभाषा।
अच्छा नहीं लगता ...

झलक खुशियों की देखी है वक़्त की पहरेदारी में
याद में ज़ख़्म का हलना हमें अच्छा नहीं लगता
कहो दामन बिछा दूँ मैं तेरी राहों के कंकर पर
ज़मीं पर चाँद का चलना हमें अच्छा नहीं लगता
क्या तुम नहीं डरते? ...

सुनो ओ!जंगल के दावेदारों
विकास के नाम पर
लालच और स्वार्थ की कुल्हाड़ी लिए
तुम्हारी जड़ को
धीरे-धीरे बंजर करते,
तुम्हारी आँखों में सपने भरकर
संपदा से भरी भूमि को
कंक्रीट में बदलते,
.....
दीदी के मनोभाव
प्रकृति से मौन संवाद,
अंतर्मन की चेतना
का स्वर शब्दांकन
ही कविता है।
आभार दीदी
अनुजा
दिव्या...