''कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो!''
ठगी-सी मनी चुपचाप जब सबकी आँखों से आंख बचाती गाड़ी में बैठ रही थी तो घर का पुराना नौकर धीरे से बुदबुदाया-खुदको संभाल बेटी। मुस्कुरा, एक भी आंसू मत गिरने देना
तू जिस जगह जागा सवेरे,
उस जगह से बढ़ के सो!''
-भवानीप्रसाद मिश्र
सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
मेरे सिरे से दिखने वाला 6/69 आपके सिरे से 9/96 दिख सकता है
या ऐसा भी होता हो
मेरे सिरे से दिखने वाला 9/96 आपके सिरे से 6/69 दिख सकता है
अन्य बातों की तरह
अपने-अपने अनुभव का ही तो होता है...
नारदमुनि कई दिन से अवकाश पर हैं। अवकाश और बढ़ने वाला है
जब तक नारदमुनि लौट कर आए तब तक आप यह पढो,
इसमें विदा होती बहिन के नाम कुछ सीख है। उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है
कि यह आप सबको बहुत ही भली लगेगी। क्योंकि यह तो घर घर की कहानी है।
दुबारा पूछा तब जब पहली बार रसोई में गईं थीं रस्म पूरी, करने तब
तब भी उनींदी सुबह में पहले उठने का दायित्व निभाती हूं जब साड़ी पहनती हूं और
कोशिश के बाद भी प्लेट पूरी नहीं बनती है जब सुबह की चाय खुद बनाकर पीती हूं ,
तब जब सब्जी में नमक ज्यादा हो जाता है, तब जब तेज आंच में सूजी थोड़ा जल जाती है
और कोई बताता नहीं हे अगली बार आंच कम रखना,
तब जब कभी थककर बिना बाल गुँथे ही सो जाती हूं ,
उसकी आंखों में पहली बार अपने लिए आंसू देखकर मेरी भी आंखें आंसुओं से लबालब हो गई। हम दोनों ने जी भर के रो लिया, और आंसुओं के साथ सारे गिले-शिकवे बहा दिए। फिर दुबारा आने का वादा भाई से करके वापस घर आ गई।
ठगी-सी मनी चुपचाप जब सबकी आँखों से आंख बचाती गाड़ी में बैठ रही थी तो घर का पुराना नौकर धीरे से बुदबुदाया-खुदको संभाल बेटी। मुस्कुरा, एक भी आंसू मत गिरने देना
पोखर के घाट
बैलगाड़ी, टमटम और हाट
कुछ खाली सा हो गया है अंदर
अपना एक अंश जैसे छूट गया वहीं
लेकिन सामानों के साथ
कुछ और भी सिमट आया साथ
परिवर्तन की आंधी में
वास्तविक कही खो गया
मिलता ब्याज पे ब्याज
वो मूलधन कही खो गया
कोपल हुआ करते थे
पीले पत्तो सा अस्तित्त्व हो गया
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अब यह मत कहना, सावन है तो..

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पुन: मिलेंगे...
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'पृथ्वी'
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