जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम ।
दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानों काम ।।
©कबीर
सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
एक-एक दिन कर हम अठारह सौ पर आ गये
हौले-हौले लू को लीलते मानसून जैसे आता है
लो! गगन में बदलियां छाने लगी हैं।
मानसूनी घटाओं की आहटें आने लगी हैं ।।1।।
सूखे जलाशयों की गर्म आहों से।
तड़कते खेतों की अबोल करुण चाहों से।
किसानों की याचनाभरी निगाहों से।
निकली प्रार्थनाएं असर दिखलाने लगी हैं।
...बदलियां छाने लगी हैं ।।2।।
हवाएं भी पतझड़ी पत्ते बुहारने लगीं।
मानसूनी फिजाओं का पथ संवारने लगीं।
टीसभरे स्वर में टिटहरियां पुकारने लगीं।
प्रकृति अपना चतुर्मासी मंच सजाने लगी है।
...बदलियां छाने लगी हैं ।।3।।
पर्जन्य या परजन्य अर्थात जो दूसरों के लिए हो, परोपकारी हो।
कवि धनानंद ने कहा है -
'पर कारज देह को धारे फिरौ परजन्य जथारथ ह्वै दरसौं।'
उन्होंने कहा था, “जब आपको
किसी कार्य के बारे में दुविधा हो,
उस समय आप देश के उस
सबसे ग़रीब व्यक्ति के चेहरे की याद कीजिए
जिसे आपने कभी देखा है और अपने से प्रश्न कीजिए कि
जो कदम आप उठाने जा रहे हैं, उससे कोई लाभ होगा या नहीं?”
यही तो है ,
कहानी
प्रत्येक
महापुरुष की
उपकार
स्व - का नहीं
पर का उपकार
सौम्य मुस्कराते हत्यारे हैं
जो खरीदते हैं रेशम, नायलॉन, सिगार,
हैं छोटे-मोटे आततायी और तानाशाह ।
वे खरीदते हैं देश, लोग, समंदर, पुलिस, विधान/ सभाएं,
दूरदराज के इलाके जहां गरीब इकट्ठा करते हैं/ अनाज
जैसे कंजूस जोड़ते हैं सोना,
कभी इधर,कभी उधर छिटक रहे थे….
बार बार रास्ता भटक रहे थे….
इरादा कहानी लिखने का था….
पर कविता लिखवाने पर अड़े थे….
कलम ने सहृदयता के साथ, उदारता दिखायी
का पूरण ज्ञानी भलो , कै तो भलो अजाण।
मूढमति अधवीच को ,जळ मां जिसों पखाण।।
भावार्थ; या तो पूरा जानकर हो या
पूरा अजान हो दोनों ही ठीक है,
लेकिन जो मूढ़ आधा जानकर है
वह तो जल में पड़े पाषण की तरह है।
चिंता बुधि परखिये , टोटे परखिये त्रिया।
सगा कुबेल्याँ परखिये , ठाकुर गुनाह कियां।।
भावार्थ;बुधि की परीक्षा चिंता के समय ,
स्त्री की घर में आर्थिक स्थिति ख़राब होने पर ,
सम्बन्धियों की ख़राब
समय आने पर व मालिक की परीक्षा गुनाह करने पर।
मूढमति अधवीच को ,जळ मां जिसों पखाण।।
भावार्थ; या तो पूरा जानकर हो या
पूरा अजान हो दोनों ही ठीक है,
लेकिन जो मूढ़ आधा जानकर है
वह तो जल में पड़े पाषण की तरह है।
चिंता बुधि परखिये , टोटे परखिये त्रिया।
सगा कुबेल्याँ परखिये , ठाकुर गुनाह कियां।।
भावार्थ;बुधि की परीक्षा चिंता के समय ,
स्त्री की घर में आर्थिक स्थिति ख़राब होने पर ,
सम्बन्धियों की ख़राब
समय आने पर व मालिक की परीक्षा गुनाह करने पर।
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पुन: मिलेंगे...
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*शरीर एवं राष्ट्र.... दोनों को स्वस्थ रखने का...*
*एक ही उपाय है*,
*👍 " चीनी बन्द " 👍*
शरीर के लिए *" देसी गुड़"* और
राष्ट्र के लिए *"देसी गुड्स/Goods"*
हम-क़दम के अगले अंक का विषय-
'प्रतीक्षा'
इस विषय पर सृजित आप अपनी रचना आज शनिवार (20 जून 2020) तक कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म के माध्यम से हमें भेजिएगा।
चयनित रचनाओं को आगामी सोमवारीय प्रस्तुति (22 जून 2020) में प्रकाशित किया जाएगा।
उदाहरणस्वरूप कविवर
डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी की कविता-
प्रतीक्षा
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