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शनिवार, 6 जून 2020

1786... चिट्ठी

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

"ओह्ह! यह शनिवार कितनी जल्दी आ जा रहा...,"
"क्यों माँ क्या हो गया?"
"शनिवार चार बजे सुबह मेरी प्रस्तुति का समय है
और शुक्रवार को पँख लगे हैं...!"
"शुक्रवार को तुम पर्यावरण में डूबी रह गई
लेकिन बहुत अच्छा वीडियो बना है।"
"समझने में उलझती हूँ
हवा, पानी, आकाश, धरा, विज्ञान, विकास,
संतोष, घृणा, आवेश समय तो लगेगा।
 काश वक्त भी थोड़ी धीमी गति से चलता।"
"आदेश में लिख दीजिए माँ वक्त को एक
चिट्ठी
बनाना चाहता हूँ तुम्हारे लिए एक किताबघर
सबसे अलहिदा,
हो जिसमें बारिस की रिमझिम,
चाँद की धूल,
मटमैले बादलों की उदासी
और
पतझड़ से रौंदे झड़बेरी के पेड़ से गिरे-
पत्तियों का दर्द।
बात चीत नहीं हो पा रही
ना जाने कितने वर्षों से
है सुरक्षित यही काफी है
इन आंखों में नींद आ जाने को
मैं जानता हूं वो खुश हैं
चिट्ठी
टपकी हुई बूंदें,छितरी हुई स्याही
बिखरे हुए अस्पष्ट शब्द,
कातरता से भींगे सिमसिम से पन्ने
माँ एक भी हर्फ पढ़ ना सकूं
इस तरह विक्षिप्त हो जाता हूं माँ 
चिट्ठी
मैं भी एक सितारा माँ
बन जाता तेरे साथ
क्यूँ नहीं मुझे भी
ले गयी अपने साथ?
गुस्सा आता है
तुम पर बहुत
तेरे जाने के बाद।
प्रेम नहीं लिखा होता
प्रेम की जगह एक लिपि अंकित होती है
उसकी आप ब्राह्मी, खरोष्ठी या कैथी से तुलना नहीं कर सकते
वह एक अन्य ही लिपि होती है
समझने की शक्ति जिसे दुनिया के सारे भाषाविद खो चुके हैं



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पुन: मिलेंगे...
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हम-क़दम के अगले अंक का विषय है-
'समर'

इस विषय पर सृजित आप अपनी रचना आगामी शनिवार (06 जून  2020) तक कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म के माध्यम से हमें भेजिएगा। 
चयनित रचनाओं को आगामी सोमवारीय प्रस्तुति (08 जून 2020) में प्रकाशित किया जाएगा। 
उदाहरणस्वरूप  साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कविवर वीरेन डंगवाल  जी की कविता-

"आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ
है हवा कठिनहड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अंधकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समरअभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चींचिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहींचूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का जरिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगेपार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन जरूर आएँगे"

-वीरेन डंगवाल

साभार: हिंदी समय

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