।।भोर वंदन ।।
" अभी तो सुबह हुई है
आओ उजालों पे छंद लिखें
रात काली आयेगी..तो
अंधेरों पर ग़ज़लें कह लेंगे
अभी चटख कर फूटे है
रंग और महक के झरने
जब झरेंगे, नश्वरता पे
मृत्यु पर जी भर रो लेंगे "
सरितात्रिवेदी .
बहुत कुछ है भविष्य में , बहुत कुछ होगा भी ..पर हम तो आज ही में जियें जा रहें.. वर्तमान की महत्तव को इंगित करते शब्दों के साथ नज़र डालें खास लिंकों पर..✍
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अगर सॉफ्टवेयर मशीन से बात बनती तो सांसद विधायक आईएएस आईपीएस अधिकारी किसी की भी कोई ज़रूरत नहीं होती। हर समस्या का डेटा सॉफ्टवेयर में अपलोड करते और समाधान हो जाता। मगर ऐसा मुमकिन नहीं है जिनको लगता है कि इक इंसान है तो सब मुमकिन है
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नई नवेली दुल्हिन
सोच रही थी
पति के साथ
मेट्रो फूलों का शहर
हाईटेक नगरी
बेंगलुरु आकर।
प्रतिदिन वह देखती
सुबह निकल पड़ता
हर मजदूर दिहाड़ी पर
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एकाएक एक दिन शाम के वक्त यह संवाद मिला कि एक वृद्धा ब्राह्मणी उस मुहल्ले में सुबह से मरी पड़ी है- किसी तरह भी उसके क्रिया-कर्म के लिए लोग नहीं जुटते। न जुटने का हेतु यह है कि वह काशी-यात्रा से लौटते समय रास्ते में रोग-ग्रस्त हो गयी, और उस शहर में, रेल पर से उतरकर सामान्य परिचय के सहारे जिनके घर आकर, उसने आश्रय ग्रहण किया,
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आ० आँचल पांडे जी...लघुकथा -
सियासतगंज बस हादसा
हफ़्तों से पैदल ही मीलों का सफ़र तय कर रहे प्रवासी मज़दूर अपने लिए भेजी गई
स्पेशल बस की सूचना मिलते ही बस की ओर तेज़ी से बढ़ते हैं।
स्पेशल बस की सूचना मिलते ही बस की ओर तेज़ी से बढ़ते हैं।
" भला हो भैया सरकार का जो हम मज़दूरों के लिए कम से कम बस की सुविधा तो करवाई
वरना इस भीषण गर्मी में चलते-चलते हमारे पैर तो अब जवाब दे चुके थे।
अरे घर क्या, इस भुखमरी और कोरोना नामक महामारी
वरना इस भीषण गर्मी में चलते-चलते हमारे पैर तो अब जवाब दे चुके थे।
अरे घर क्या, इस भुखमरी और कोरोना नामक महामारी
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मेरी कलम की स्याही सूख गई है
क्या यह कोई अजूबा है ?
नहीं यह एक तजुर्बा है
जब मन ना हो कुछ लिखने का
अपने विचार व्यक्त करने का
तब कोई तो बहाना चाहिये
मन में आए इस विराम को
किसी का तो उलाहना चाहिए..
।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍


