सादर अभिवादन।
देखो संतुलन बनाकर चल रहे हैं,
वे चालाक हथियार व्यापारी देश;
दो देशों में तनाव ख़ूब बढ़ जाय,
हम भी समझ सकते हैं यह वेश।
-रवीन्द्र
आइये पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
जीवन यात्रा......कैलाश शर्मा

बढ़े हाथ उनको ठुकराया,
अपनों की खुशियों की खातिर।
लेकिन आज सोचता हूँ मैं,
अपने दिल की क्यूँ न माना।
एक गीत-बापू ! रहे हिमालय....... जयकृष्ण राय तुषार
जीवन यात्रा......कैलाश शर्मा

बढ़े हाथ उनको ठुकराया,
अपनों की खुशियों की खातिर।
लेकिन आज सोचता हूँ मैं,
अपने दिल की क्यूँ न माना।
एक गीत-बापू ! रहे हिमालय....... जयकृष्ण राय तुषार

लड़े गुलामी
और दासता की
अभेद्य प्राचीरों से,
एक लुकाठी
लड़ी हजारों
बन्दूकों-शमशीरों से,
चम्पारण
दांडी का नायक
विजयी था,कब हारा है?

मैं भी तैयारी में हूँ
एक अनन्त यात्रा की
जो बिल्कुल पहली बार होगी
और कुछ नहीं होगा साथ
सिवाय तन पर एक सफ़ेद लिबास के...

हुस्नवालो से कहो हमे हवस नही मोहब्बत है
मेरा बस चले तो आस्मां पे वफा लिखूं
गुल को छोड पत्थर चुननेवालों को क्या कहें
मुझे क्या गरज कि किसी को बेवफा लिखूं

हर दिन जियो , जियाले
जैसा जीवन अपना पाओ।
जब मूसल हो , मारो
जब ओखल हो,चोंट खाओ।

सभी पात्र आमरण अनशन पर बैठ गए। दिन बीत रहे थे, पात्रों की हालत खराब थी,खासकर नायिकाओं की,वे बेहोश होने की कगार पर थीं,तब एक बुजुर्ग पात्र ने आवाज उठाई और लेखक के दिमाग को झिंझोड़ते हुए कहा-कब तक सोएंगे लेखक महोदय!!समाज को तुम्हारी लेखनी की जरूरत है और तुम लंबी तान के सो रहे हो, तुम्हारी कहानियों के सभी पात्र अब मरणासन्न हो गये है ,ऐसा न हो कि तुम जागो तो तुम्हारे पास लिखने के लिए कुछ भी न हो,कोई लेखक कैसे सो सकता है जब समाज पतन की ओर अग्रसर हो ,उठो और अपने कर्त्तव्य की पूर्ति करो।
आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में।
रवीन्द्र सिंह यादव