सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
ब्लोगर के हैसियत से कुछ नहीं बदला है ,नहीं बदला है चर्चाकार के मायने से , कुछ नहीं बदला है मेरे निजी जिन्दगी में। लेकिन एक बिहारी होने के नाते सबकुछ बदल गया है। अत: आज बस एक लिंक से समझेंगे
पत्थर के ही हो न तुम
उसी तरह निर्विकार भाव से
सबको अपनाते रहोगे
मेरे बुझने के बाद भी ...
क्यूंकि तुम्हें पता है
तुम पूजे जाते रहोगे
भक्त नए रूपों में आते रहेंगे
पूजा और दीये की थाली ले कर.........
श्रद्धा और विश्वास की घंटियां
रुनझुन बजती रहेगी
तुम्हारे गुणगान करती रहेंगी
देख रही हूँ पूरा देश किसी बड़े डैने के नीचे विनाश की प्रतीक्षा में है...
स्वाभाविक प्रकृति से कोई शिकायत नहीं। लेकिन अपनों को मेरी आज जरूरत ज्यादा है
फिर मिलेंगे
><
इक्यानवेवाँ विषय
पर्दा / पर्दे / परदा / चिलमन /
उदाहरण..
पूरा
कर लें मनभेद
इस से
अच्छा माहौल
आगे
होना भी नहीं है
झूठ सारे
लिपटे हुऐ हैं
परतों में
पर्दे में
नहाने की
जरूरत
भी नहीं है
बन्द
रखनी हैं
बस आँखें
रचनाकार....डॉ. सुशील जी जोशी