स्नेहिल अभिवादन
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सोचती हूँ किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान,
तुझको पत्थर कहते हुये
ख़ुद बुत बना इंसान।
हृदय संवेदनहीन है
न धरम कोई न दीन है,
बिक रहा बाज़ार में
फर्ज़ और ईमान,
सोचती हूँ किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान।
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आदरणीया शशि पुरवार जी
व्यर्थ कभी होगा नहीं, सैनिक का बलदान
आतंकी को मार कर, देना होगा मान२
चैन वहां बसता नहीं, जहाँ झूठ के लाल
सच की छाया में मिली, सुख की रोटी दाल३
लगी उदर में आग है, कंठ हुए हलकान
पत्थर तोड़े जिंदगी, हाथ गढ़े मकान४
आतंकी को मार कर, देना होगा मान२
चैन वहां बसता नहीं, जहाँ झूठ के लाल
सच की छाया में मिली, सुख की रोटी दाल३
लगी उदर में आग है, कंठ हुए हलकान
पत्थर तोड़े जिंदगी, हाथ गढ़े मकान४
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आदरणीया सुधा सिंह "व्याध्र"
मेरी रगों में
लहू बनकर
बहने वाले तुम
ये तो बता दो कि
मुझमें मैं बची हूँ कितनी
तुम्हारा ख्याल जब - तब
आकर घेर लेता है मुझे
और कतरा - कतरा
बन रिसता हैं
मेरे नेत्रों से.
★★★★★★
चंद्रकांत देवताले
यदि मुझे औरतों के बारे में
कुछ कहना हो तो मैं तुम्हें ही पाऊँगा अपने भीतर
जिसे कहता रहूँगा बाहर शब्दों में
जो अपर्याप्त साबित होंगे हमेशा
कुछ कहना हो तो मैं तुम्हें ही पाऊँगा अपने भीतर
जिसे कहता रहूँगा बाहर शब्दों में
जो अपर्याप्त साबित होंगे हमेशा
★★★★★
अनिता सैनी
ज़िंदगी के लिए दौड़ रही दुनिया
वक्त , ज़िंदगी का निगल गई
तराजू से तौल रहे प्रीत
ज़िंदगी , प्रीत को तरस गई |
वक्त , ज़िंदगी का निगल गई
तराजू से तौल रहे प्रीत
ज़िंदगी , प्रीत को तरस गई |
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उलूक के पन्नों से
आदरणीय सुशील सर
कलम
लिखने वाले की
खुद ही फितूरी है
उलझ
लेते हैं फिर भी
पढ़ने पढ़ाने वाले
लिखने वाले की
खुद ही फितूरी है
उलझ
लेते हैं फिर भी
पढ़ने पढ़ाने वाले
★★★★★
आज यह अंक
आप सभी को.कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की
सदैव प्रतीक्षा रहती है।
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हमक़दम के विषय के लिए
★
कल का अंक पढ़ना न भूले
कल आ रही हैं विभा दी
अपनी विशेष प्रस्तुति के साथ।
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