सादर अभिवादन
भाई कुलदीप जी आज नहीं हैं
भाई कुलदीप जी आज नहीं हैं
सो आज फिर हमारी ही पसंद..
सच मे आप परेशान हो जाएँगे
पसंदगी में एक रूपता पाकर..
तो...चलें छुट्टियों के माहोल को खुशनुमा बनाएँ...
सच मे आप परेशान हो जाएँगे
पसंदगी में एक रूपता पाकर..
तो...चलें छुट्टियों के माहोल को खुशनुमा बनाएँ...

भरे उर मे बैचनियाँ
शफरियों को ढूँढता
सागर के उस पार
मांझियों का कारवां
तप्त भानु रश्मियाँ
उमस की दुश्वारियाँ
संजोए मन में आस
गीत गुनगुना रहा

खुद को मिटाते रहे उसके नाम के खातिर,
खुद को झुकाया हमने उसके एहतराम के खातिर।
सुना था इश्क़ में हीर राँझा हो जाते हैं,
हमने भी इश्क़ कर लिया इस इनाम के खातिर।

तुम्हारे बच्चों की माँ को
उनके साथ सोता छोड़कर
एक औरत दुनिया में लौटती है
हँसती है
जितना वो चाहें
जब वो चाहें और
पहनती है जो वो चाहें
उतारती है जब वो चाहें

खाना नाही, बिजली आउर पानी नाही बा
इ शहर में आउर कौनो परेशानी नाही बा
मनई क देखा कान कुतर देहलेस चूहवा
लागेला कि इ शहर में चूहेदानी नाही बा

अगर सूरज हो,
तो बाहर आओ,
बादलों में दुबके रहोगे,
तो कोई नहीं पूछेगा तुम्हें.
पहाड़ों के पीछे से,
समुद्र के पार से,
जहाँ से भी निकल सको,
पूरे सौंदर्य में निकलो.
कभी-कभी सुबह-सुबह देखने आना-
वह नदी, जो बचपन से बह रही है,
वह पहाड़, जो अडिग है,
वह मृत्यु ,जो पल पल देखी गयी है,
वह समुद्र, जो गरजता रहता है,
वह जंगल, जो बीहड़ हो चुका है।
इस पर लिखना
उस पर लिखना
लिखते लिखते
कुछ भी लिखना
बहुत कुछ ऐसे ही
लिखा जाता है
लिखते लिखते भी
महसूस होना कि
कुछ भी नहीं
लिखा जाता है
हर लिखने वाला
इसी मोड़ पर
बहुत ही कंजूस
हो जाता है
आज तो बस इज़ाज़त दे ही दीजिए
यशोदा

