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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

1215....फिर कुछ प्रश्न......


जय मां हाटेशवरी.....
कुछ दिनों से लौह-पुरुष की सबसे बड़ी प्रतिमा का विरोध हो रहा है.....
...पर मैं कुछ नया बनने का विरोध नहीं करता......
ये भी देश के लिये एक पर्यटक स्थल ही बन गया है.....
जो पैसा इस प्रतिमा पर खर्च हुआ है.......
संभव है.....
पर्यटक उसे एक न एक दिन लौटा ही देंगे.....
इसके बनने से न जाने कितनों को रोजगार भी तो मिला ही होगा......
और कितनों को भविष्य में यहां रोजगार मिलेगा......
ये सोचे बिना हम केवल हर नयी चीज का विरोध ही करते हैं......
अब पेश है.....आज के लिये मेरे द्वारा पढ़े गये 5 लिंक.....

राह तुम्हारी  तकते  - तकते ----------  कविता --
राह तुम्हारी तकते - तकते----------------कविता --
था धूल सा निरर्थक ये जीवन -
छू रूह से किया चन्दन तुमने ,
अंतस का धो सब  ख़ार दिया -
किया निष्कलुष और पावन तुमने ;
निर्मलता के तुम मूर्त रूप -
कोई तुम सा कहाँ सरल साथी !!!

मेरी फ़ोटो
अतिथि अपने घर के
सब झेलना पड़ता है, मजबूरन
सब सहना पड़ता है,
सब सह रहे हैं
अपने ही घर में अतिथि बनकर रहना पड़ता है
रह रहे हैं.....वो भी
चेहरे पर बिना किसी शिकन के...


फिर कुछ प्रश्न......
बेनामी रिश्ते की पीड़ा
पंछी और पेड़ से पूछो,
दुनिया के रस्मो रिवाज में
इस रिश्ते को भूलूँ ? बोलो !!!
इस दिल ने क्यों मान लिया हक
किसी गैर की धड़कन पर,
कैद कहीं इस दिल को कर दूँ
या अधिकार सँजो लूँ ? बोलो !!!

post-feature-image
लघुकथा- परवरिश
दिपाली के चेहरे से बिल्कुल ऐसा नहीं लग रहा था कि उसने कोई गलती की हैं। वो मेरे पास आकर कहने लगी, ''मम्मी, कल आपने मुझे समझाया था न कि गुड टच और बैड टच क्या होता हैं। दादाजी कई बार मुझे टच करते थे तो मुझे अच्छा नहीं लगता था। लेकिन ऐसे में मैं क्या करूं मुझे समझ में नहीं आता था। आपके समझाने पर मेरी समझ में आया कि ये बैड टच हैं और इसे हमें रोकना चहिए। आपने मुझे मिर्च स्प्रे दिया था और कहा था कि यदि कोई तुमको बार-बार बैड टच करे, मना करने पर भी नहीं माने तो यह मिर्च स्प्रे उसकी आंखों में डाल देना। आज तो दादाजी ने मुझे अकेली देख कर जोर से पकड़ लिया था। इसलिए मैं ने वो मिर्च स्प्रे दादाजी की आंखों में डाल दिया!!!''


भाव के रंग
रंग उमंग के उड़ गाते
भीड़ लगाते रिश्ते नाते ,
ढोल नगाड़े चीखते रहते
हरे बांस की सजती डोली ।।
पिया के आने की आशा में
भाव रंग से बनी रंगोली.....।।

मेरी फ़ोटो
एक प्रतिमा विशाल भी होगी ...
सब्जी, रोटी के साथ है मीठा 
आज डब्बे में दाल भी होगी
उनकी यादों के अध-जले टुकड़े
आसमानी सी शाल भी होगी
यूँ उजाला नज़र नहीं आता
चुप सी जलती मशाल भी होगी
प्रेम जीता हो दिल में तो अकसर
एक प्रतिमा विशाल भी होगी

और अब बारी है हम-क़दम के पैंतालिसवें विषय की

अतिथि

सब झेलना पड़ता है, मजबूरन
सब सहना पड़ता है,
सब सह रहे हैं
अपने ही घर में अतिथि बनकर रहना पड़ता है
रह रहे हैं.....वो भी
चेहरे पर बिना किसी शिकन के...

ये विषय इसी अंक सा लिया गया है
भविष्य में भी ऐसा हो सकता है
पूरी रचना यहाँ पढ़ सकते हैं


प्रेषण तिथिः  शनिवार दिनांक 17 नवम्बर 2018
प्रकाशन तिथिः सोमवार दिनांक 19 नवम्बर 2018
प्रविष्टियाँ सम्पर्क प्रारूप में ही स्वीकार्य


धन्यवाद।
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