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गुरुवार, 8 नवंबर 2018

1210....‘तमसो,मा ज्योतिर्गमय’....

सादर अभिवादन।
पाँच दिवसीय दीपावली के त्यौहार का 
आज चौथा दिन। 
भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व। 
हार्दिक मंगलकामनाएँ। 
हिन्दी प्रेमियों के लिये गर्व का बिषय है कि इज़राइल के प्रधानमंत्री की ओर से हमारे प्रधानमंत्री को हिन्दी में दीपावली का शुभकामना सन्देश ट्विटर के ज़रिये भेजा गया।  हम उनकी भावना की क़द्र करते हैं। 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-  




उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी।।



भर दे झोली 
सँँवार दे जीवन 
नतशिर हूँ आज 
कर दे अनुकम्पा 
पूरी कर आशा 
 बना दे काज !   


हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.




बना कर देह का दीपक,
जलाओ स्नेह की बाती,
मिटे मन का अँधेरा भी,
प्रकाशित हो धरा सारी |


My photo

सितारे न जाने कहाँ खो गए
नज़ारे सब खामोश क्यों हो गए
हवा भी अब तो बदल चुकी
न जाने तुम कब आओगे

चलते-चलते एक नज़र इधर भी-


मेरी फ़ोटो

कालकूट-प्रेमियो,बरसों पहले ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का जो पाठ हमने तुम्हें पढ़ाया था,अब उसके पुनर्पाठ की ज़रूरत है।यह हमारा भ्रम था कि हम तम से प्रकाश की ओर भाग रहे थे।दरअसल,यहाँ तम के बाद एक पॉज अर्थात रुकावट है,जिसे हम नहीं समझ पाए।नए संस्करण में यह ‘तमसो,मा ज्योतिर्गमय’ हो गया है,जिसका भावार्थ है कि अंधकार की ओर अग्रसर हों,प्रकाश की ओर क़तई नहीं।

    हम-क़दम के 
                              चवालीसवें अंक का विषय
                              यहाँ देखिए..

आज बस यहीं तक। 
शुक्रवारीय प्रस्तुति - आदरणीया श्वेता सिन्हा जी 

रवीन्द्र सिंह यादव 

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