तृष्णा का अर्थ प्यास, इच्छा या आकांक्षा से है। सांंसारिक बंधन
के जन्म से मृत्यु तक के चक्र में मानव जीवन की कथा लिखी
जाती है। मनुष्य को इस मायावी जग से बाँधे रखने के लिए काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार जैसे भाव होते है। मनुष्य
मन में पनपे विचार,इच्छा के रुप में अंकुरित होते हैं और
इस इच्छा की जड़े जब मजबूत होकर मन मस्तिष्क पर
राज करने लगती है तो वह तृष्णा कहलाती है।
जिस प्रकार हवन में डाली जाने वाली समिधा से अग्नि प्रचंड होती है
वैसे ही तृष्णा की तृप्ति दुष्कर है।
किसी को धन की तृष्णा, किसी को प्रेम की, किसी को जीवन की
किसी को यश की,संपूर्ण जीवन मनुष्य अपनी तृष्णा को
तृप्त करने के प्रयास में भटकता रहता है।
छलना जग की माया में
भ्रमित मृग-सा फिरता है
आना-जाना खाली "कर"
जाने भरता है किस घट को
हरपल तृष्णा मेंं झुलसता है
-श्वेता
हमक़दम के विषय "तृष्णा" पर रचनाकारों की विलक्षण लेखनी से पल्लवित अद्भुत पुष्पों की सुगंध आप भी महसूस कीजिए।
चलिए आपके द्वारा सृजित रचनाओं के संसार में-
के जन्म से मृत्यु तक के चक्र में मानव जीवन की कथा लिखी
जाती है। मनुष्य को इस मायावी जग से बाँधे रखने के लिए काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार जैसे भाव होते है। मनुष्य
मन में पनपे विचार,इच्छा के रुप में अंकुरित होते हैं और
इस इच्छा की जड़े जब मजबूत होकर मन मस्तिष्क पर
राज करने लगती है तो वह तृष्णा कहलाती है।
जिस प्रकार हवन में डाली जाने वाली समिधा से अग्नि प्रचंड होती है
वैसे ही तृष्णा की तृप्ति दुष्कर है।
किसी को धन की तृष्णा, किसी को प्रेम की, किसी को जीवन की
किसी को यश की,संपूर्ण जीवन मनुष्य अपनी तृष्णा को
तृप्त करने के प्रयास में भटकता रहता है।
छलना जग की माया में
भ्रमित मृग-सा फिरता है
आना-जाना खाली "कर"
जाने भरता है किस घट को
हरपल तृष्णा मेंं झुलसता है
-श्वेता
हमक़दम के विषय "तृष्णा" पर रचनाकारों की विलक्षण लेखनी से पल्लवित अद्भुत पुष्पों की सुगंध आप भी महसूस कीजिए।
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