"किसी देश की सांस्कृतिक सभ्यता समृद्ध होगी
जब उस देश की राजभाषा का उचित सम्मान होगा।"
जब उस देश की राजभाषा का उचित सम्मान होगा।"
मात्र एक सुंदर भावपूर्ण पंक्ति से ज्यादा उपर्युक्त कथन का अभिप्राय हमने कभी समझा ही नहीं या यों कहें हिंदी की औपचारिकता पूरी
करने में हम हिंदी को आत्मसात करना भूल गये।
करने में हम हिंदी को आत्मसात करना भूल गये।
स्वतंत्रता प्राप्ति के ७२ साल पश्चात भी अपनी देश की सभ्यता
और संस्कृति में घुलने के प्रयास में राजभाषा
हिंदी की आत्मा आज भी बिसूर रही है।
और संस्कृति में घुलने के प्रयास में राजभाषा
हिंदी की आत्मा आज भी बिसूर रही है।
क्या बिडंबना है हज़ार साल पुरानी हिंदी को गुलाम बनाने वाली
अंग्रेजी आज शान से परचम लहराये अभिजात्य वर्ग के बैठकों
से लेकर गली-मुहल्ले तक उन्मुक्तता से ठहाका लगा रही है
और हिंदी अपने ही घर में मुँह छुपाये शरम से गड़ी जा रही है।
अंग्रेजी आज शान से परचम लहराये अभिजात्य वर्ग के बैठकों
से लेकर गली-मुहल्ले तक उन्मुक्तता से ठहाका लगा रही है
और हिंदी अपने ही घर में मुँह छुपाये शरम से गड़ी जा रही है।
हिंदी साहित्य हिंदी को समृद्ध बनाने की आधारशिला है।
हिंदी साहित्य के झंड़ाबदारों से विनम्र निवेदन है-
रचनात्मकता का पैमाना तय करना उचित नहीं है।
क्लिष्ट या सरल लिखना अपनी क्षमता और रुचि पर निर्भर है।
क्या लिखा जाय ,किस पर लिखा जाय,कितना लिखा जाय
यह बहस का कोई मुद्दा नहीं।
यह बहस का कोई मुद्दा नहीं।
हाँ,जो भी लिखा जाय वह मौलिक हो और उसकी
वर्तनी शुद्ध हो यह जरुरी है।
वर्तनी शुद्ध हो यह जरुरी है।
"भावी पीढ़ी आपसे वही सीख रही है जो आप सिखा रहे हैं इस बात
का ध्यान रखना हम सभी रचनाकारों की मूल ज़िम्मेदारी है।"
का ध्यान रखना हम सभी रचनाकारों की मूल ज़िम्मेदारी है।"
सादर नमस्कार
★
चलिये अब आज की रचनाएँ पढ़ते है-
★
आदरणीय विश्वमोहन जी की
प्रबुद्ध विचारोत्तेजक लेखनी से-
प्रबुद्ध विचारोत्तेजक लेखनी से-
हमारी वर्तमान हिंदी ने भी अपने इस स्वरुप में गढ़े जाने के
पहले किसिम किसिम की मंडियों की तेज़ी और मंदी की
खुरदराहट और फिसलन से गुजरते हुए अपनी जमीन तैयार
की है. यह प्रक्रिया सनातन है और सनातन जारी रहेगी.
हाँ, पहले ही मैं आपको साफ़ कर दूँ कि भाषा के दो रूप
समानांतर चलते हैं. एक उसकी बोल चाल और रोज रोज
के चलन का उसका सामजिक व्यावहारिक चोला और
दूसरा उसका साहित्यिक झोला! आगे आगे समाज,पीछे पीछे साहित्य! आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है.
पहले किसिम किसिम की मंडियों की तेज़ी और मंदी की
खुरदराहट और फिसलन से गुजरते हुए अपनी जमीन तैयार
की है. यह प्रक्रिया सनातन है और सनातन जारी रहेगी.
हाँ, पहले ही मैं आपको साफ़ कर दूँ कि भाषा के दो रूप
समानांतर चलते हैं. एक उसकी बोल चाल और रोज रोज
के चलन का उसका सामजिक व्यावहारिक चोला और
दूसरा उसका साहित्यिक झोला! आगे आगे समाज,पीछे पीछे साहित्य! आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है.
★★★★★★
आदरणीया अभिलाषा जी की बेहद हृदयस्पर्शी रचना
आज बाबूजी उठे नहीं थे
अम्मा काम समेटने में व्यस्त
कि घर थोड़ा सा सही हो जाए
तो उनके नहाने का पानी गर्म करें
बार-बार घड़ी देखतीं
फिर छनकते हुए बर्तन सहसा सम्हालतीं
कहीं नींद न टूट जाए,
रोष तो बस बाबूजी को था
★★★★★
आदरणीया एस.नेहा की क़लम से-
क्षितिज के उस पार
जहाँ मेरी जाने के ख्वाहिश हैं
वहां न ख्वाहिशों की बेड़ियाँ हैं
और न ही रिश्तों का दोहरापन
वहाँ न ही उम्मीदें हैं
और न ही किसी प्रकार का सूनापन
★★★★★★
आदरणीय रोहिताश जी की लिखी रचना
उस सिलवटों भरे बिस्तर से
उस सोच से जिसमें तू रहता है
तन्हाई वाले ख्यालों से
उस तबियत से
बगैर तेरे जो रफ्ता रफ्ता बिगड़ रही है
★★★★★
और चलते-चलते पढ़िए आदरणीय शशि जी की भावपूर्ण लेखनी की अभिव्यक्ति
और चलते-चलते पढ़िए आदरणीय शशि जी की भावपूर्ण लेखनी की अभिव्यक्ति
वाराणसी में हरिश्चन्द्र इण्टर कालेज में पूरे चार वर्षों तक मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते ही सामने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ही तो प्रतिमा का दर्शन होता था और स्मारक पर मोटे अक्षरों में यह अंकित है.
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
★★★
आज का अंक आपको कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी
हम-क़दम रे विषय के सम्बन्ध में
यहाँ देखिए
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आज के लिए आज्ञा दीजिए
आदरणीय विभा दीदी
कल मिलेगी आप सब से
हिन्दी दिवस पखवाड़े के
साथ प्रस्तुत होंगी
-श्वेता
आदरणीय विभा दीदी
कल मिलेगी आप सब से
हिन्दी दिवस पखवाड़े के
साथ प्रस्तुत होंगी
-श्वेता




