श्रीकृष्ण का जन्म युग परिवर्तन सामाजिक,राजनीतिक,आध्यात्मिक मूल्यों को
नवीन दृष्टि प्रदान करने के लिए हुआ था।
श्रीकृष्ण का चरित्र संपूर्ण सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन का अलौकिक,अद्भुत,मनमोहक
और आकर्षक स्वरूप है। सर्वशक्तिमान होते हुये भी श्रीकृष्ण का कंस के कारागृह में जन्म लेना,
अजर-अमर होकर भी एक साधारण तीर के लगने पर प्राण त्यागने के प्रसंग तक उनका
जीवन अविश्वसनीय और विचित्र लीलाओं का अनिर्वाच्य संगम है।
अलौकिक प्रेम को परिभाषित करने वाले कृष्ण,सच्ची मित्रता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
कृष्ण की बाल लीलाएँ ,राजनीतिक चरित्र, गीता के उपदेश,आज हमारे देश ,समाज,और
खासकर युवाओं के लिए दिशानिर्देशक है।
कृष्ण को शब्दों में बाँधना असंभव है।
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अब चलिए आज के हमक़दम के विषय की ओर।
बैरी,शत्रु, अरि या दुश्मन जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति
व्यक्तिगत घृणा,द्वेष या दुराग्रह का भाव रखता है तो उसे बैरी नाम से परिभाषित किया जाता है।
हमेशा की तरह हमारे नियमित रचनाकारों की प्रतिभा संपन्न, मुखर लेखनी से प्रसवित रचनाओं ने बैरी शब्द पर अप्रतिम और सार्थक रचनाओं की इंद्रधनुषी छटा बिखेरी है।
आइये आप भी रचनाओं का आस्वादन करिये।
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आदरणीया कुसुम कोठारी जी
किनारे पे बैठ इंतजार किया किये
शाम ढलने तक न आया परदेशी
"बैरी नदिया" उफन उफन बहती रही।
★★★★★
आदरणीया आशा सक्सेना जी
सच्ची मित्रता के लिए
मन मारना पड़ता है
उसे बरकरार रखने के लिए
बैर भाव पनपने में तो देर नहीं होती
पर बैर मिटाने में वर्षों लग जाते हैं
तब भी दरार कहीं रह जाती हैl
★★★★★
बैरी निंदिया
एकटक देख रहे हैं छत की ओर
ये बैरन नींद भी न आती,
तुम्हारी यादों की दस्तक है,
जो नींद को दरवाजे के उस पार खड़ा कर रखा है
किसे कहूँ बैरी तुम्हारी यादों का
मेरी नींद को...
★★★★★
आदरणीया साधना वैद जी
किसे माने वह अपना बैरी
उस माँ को जिसने उसे जीवन दिया
एक कच्ची मिट्टी के ढेर को
आकार दे उसकी सुन्दर मूरत गढ़ी
सद्शिक्षा और सद्संस्कार दे
उसके व्यक्तित्व को निखारा सँवारा
संसार के सारे सुख और खुशियाँ दीं
★★★★★
विरहिणी जागे सारी रैन
पिया की याद में तरसे नैन
उमड घुमड़ घटा घिर आई
बिजूरि चमके सारी रैन
बैरी भये सावन के बदरवा
पिया की याद में जरे करेजवा
कैसे आये जिया को चैन
★★★
मन के बैरी पांच भए
मन को अपने वश में किए
काम क्रोध मद लोभ मोह
मन में पनपे उपेक्षा द्रोह
अति कामी व्यभिचार में डूबा
चरित्रहीन उस सम न दूजा
क्रोध समान न बैरी कोय
★★★★★
ख्वाबों के महल
बहुत बड़े हैं
राह में अजगर
बहुत पड़े हैं
कैसे मंजिल
को में पाऊं
जमाना बैरी बन बैठा
★★★★★
चलते-चलते पढ़िये
बैरी भईल ई सावन के महीनवां
न बुझेला जियरा का हाल हो बैरी सजनवां
हर वकत तरसाये तड़फाये ला हो बैरी सजनवां
जब जब लगाईला सिन्दूरवा हो बैरी सजनवां
आवे ला तोहार याद ओ बैरी सजनवां
जब जब लगाईला माथे पर टिकुली हो सजनवां
★★★
एक गीत
सजनवा बैरी हो गये हमार
सजनवा बैरी हो गये हमार
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आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।
अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।
अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ








