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सोमवार, 20 अगस्त 2018

1130....हम-क़दम का बत्तीसवाँ क़दम....

सादर अभिवादन...

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
मैं नीर भरी दुख की बदली
        ------------- महादेवी वर्मा 

इन पंक्तियों में छुपा सार संपूर्ण जीवन दर्शन है।
जीवन से मनुष्य का परिचय शिशु के रुप में होता है, उस शिशु का सर्वप्रथम परिचय माँ की गंध से 
होता है। धीरे-धीरे जीव सासांरिक स्वरुप से गंध और स्पर्श द्वारा,अचेतन से चेतनावस्था में 
प्रवेश करते समय  परिचित होता है।

बतायी गयी,समझायी गयी और स्वयं की तार्किक बुद्धि द्वारा मन का, किसी जीव के 
बाह्य स्वरूप को पहचानना परिचय कहलाता है। किसी व्यक्तित्व के अच्छे-बुरे स्वरूप 
को जानना उस जीव के आंतरिक रुप से परिचित होना कहलाता है।
परिचित वह है जिसके अंतर्मन के भावों को आप पहचानते है।
छोड़िये मेरी दार्शनिक परिभाषा को।
साधारण शब्दों में कहूँ तो
चिर-परिचित व्यक्तित्व 
परिचित कहलाते हैं।

हमारे इस सप्ताह के विषय
"परिचित"
पर हमारे प्रिय रचनाकारों द्वारा रची गयी 
अद्भुत रचनाओं का आप भी आनंद
लीजिए।
★★★
आदरणीया कुसुम कोठारी

जब आंख खोली सब अजनबी थे
न था कोई परिचित ,सभी तो अजनबी थे
पहले पहल एक अद्भुत हल्की
महक लगी परिचित
मां की महक
अंजान हाथ जब छूते
तन को लिये स्नेह अपार
★★★
आदरणीया अभिलाषा चौहान
J
 मैं हूं अपरिचित तेरे रूप से
जानती हूं बस कि इतना
तू है यहीं कण - कण बसा
सृष्टि के हर रूप में
ये चमकते चांद-तारे
उदित दिनकर भुजा पसारे
ये चहकते पंछी सारे
तेरे रूप का विस्तार हैं
★★★

आदरणीया आशा सक्सेना

बस मेरी बनी यही पहचान 
श्रीमती हैं घर की शान |
अब मैं भूली अपना नाम 
माँ की बिटिया ,गुरु की शान 
उनकी अपनी प्यारी पत्नी 
अब तो बस इतनी ही है 
मेरी अपनी यह पहचान 
बनी मेरी अब यही पहचान |
★★★

 आदरणीया अनुराधा चौहान

यह जिंदगी ही है
जो कराती सबका परिचय
इस सुंदर दुनिया से
यह जिंदगी मुझे मिली
मेरा मुझ से परिचय हुआ
मुझे एक नाम मिला
इस दुनिया से परिचय हुआ
बड़ी कमाल है जिंदगी
★★★

 आदरणीया अभिलाषा चौहान

तीज-त्योहार भी ऐसे आते
मिलकर सब एक घर हो जाते
अब तो सब औपचारिक है बस
सभी बंध गए दायरों में बस
बदल गई हैं सब रीत पुरानी
जिनसे परिचित थी अंजानी
बदल गई अब जीवन शैली

★★★

आदरणीया साधना वैद जी

कर दिया तूने मुझे परिचित
कठिन उस राह से
जिसमें केवल ठोकरें थीं,
कष्ट थे और शूल भी
कर लिए स्वीकार मैंने
जान कर तोहफा तेरा
वरना मेरी राह में
खुशियाँ भी थीं और फूल भी !
★★★

आदरणीया साधना वैद जी

अभी तक समझ नहीं पाई कि 
भोर की हर उजली किरन के दर्पण में 
मैं तुम्हारे ही चेहरे का 
प्रतिबिम्ब क्यों ढूँढने लगती हूँ ?
हवा के हर सहलाते दुलराते 
स्नेहिल स्पर्श में
मुझे तुम्हारी उँगलियों की 
चिर परिचित सी छुअन 
क्यों याद आ जाती है ?
★★★
और चलते -चलते आदरणीया रेणु जी की रचना

पुलकित हो  प्रीत - प्रांगण  में  
हो   निर्भय   मैं विचरूं,
भर  विस्मय  में  तुम्हे निहारूं
रज बन पथ में  बिखरूं ;
हुई खुद से  अपरिचित सी   मैं -
यूँ  तुझमे हुआ विलय मेरा !!!!!!!!

★★
आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।

अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ

-श्वेता सिन्हा
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