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शुक्रवार, 18 मई 2018

1036..हमें आदत हो गयी है अब तो ऐसे समाचारों की

"सावधानी हटी,दुर्घटना घटी" 
 "सुरक्षा प्रथम,काम हरदम"|
सारे अनमोल नारे धरे के धरे रह गये जब भीड़ भरे 
बनारस के व्यस्तम इलाक़े में लापरवाही से रखा निर्माणाधीन 
पुल का  गार्डर(बड़ा बीम) भरभरा कर गिर पड़ा। चंद पलों में 
ज़िदगी के सफ़र के राही मौत की आगोश में समा गये। ऐसे हादसे 
पहली बार नहींं हुये हैं। आख़िर क्यों हर बार सात्वंना, मुआवजा 
और संवेदना के जुमलों के साथ हम नये हादसों का पुल तैयार करते हैंं ? सबक लेकर सतर्कता का, सुरक्षा के सही मानकों का कड़ाई से पालन कर कोई और हादसा न हो क्यों नहीं सुनिश्चित करते हैं?


धन या पद से संबंधी भ्रष्टाचार तो फिर भी समझ में आता है पर मानव जीवन के मूल्य पर यह लापरवाही? इस संबंध में बेहद गंभीरतापूर्वक विचार होना आवश्यक है।  जब तक इस हादसे पर जाँच कमेटियां अपने रिपोर्ट देगी तब तक कोई नया हादसा तैयार मिलेगा। हमें आदत हो गयी है अब तो ऐसे समाचारों की, तभी तो दैनिक क्रियाकलापों की तरह संवेदना प्रकट कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।

||  सादर नमस्कार  ||

चलिए अब आप के द्वारा सृजित रचनाओं के संसार में चलते हैं 
आप भी आनंद लिजिए-

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आदरणीया सुधा सिंह जी की बेहद सुंदर और सारगर्भित रचना
हाँ इंसान,
जो कभी हुआ करते थे
कब हुए वो लुप्त, अज्ञात है ये बात.
डायनासोर, डोडो पक्षी
या जैसे लुप्त हुई
कई अन्य प्राणियों की जात 


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आदरणीया मीना शर्मा जी की लिखी सुंदर गज़ल

My photo
इक सितारा आसमां में है मेरे भी नाम का,
उसको आँखों में छुपाना, बस यही है ज़िंदगी !

मरने की तो लाख वजहें हैं जहां में दोस्तों !
एक जीने का बहाना, बस यही है ज़िंदगी !


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आदरणीय रंगराज अयंगर सर की लिखी हृदयस्पर्शी रचना
छोड़ दें दुनियां
किसी एक की खातिर
न हो मुमकिन ये मगर,
पर किसी एक की खातिर,
ये दुनियां रुके,
ये भी जरूरी तो नहीं.
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आदरणीया पुरुषोत्तम जी की लिखी मर्मस्पर्शी रचना
कोलाहल

खामोश रहा वो, सागर की तट पर,
चुप्पी तोड़ती, उन लहरों की दस्तक पर,
हाहाकार मचाती, उनकी आहट पर,
सहज-सौम्य, सागर की अकुलाहट पर!

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आदरणीय मीना भारद्वाज की रचना
"गूफ्तगू"(ताकाँ)
मेरी फ़ोटो
मेरे अपने
तेरा हाथ पकड़
चलना चाहूं
एक नई डगर
बन के सहचर
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और चलते-चलते आदरणीय ध्रुव जी की गंभीर कलम से
गहन मर्मस्पर्शी रचना
चार पाये
उखाड़ता हूँ,रह-रहकर 
कुछ बाल पके-से 
छुपाने हेतु,
अपने उम्र की नज़ाकत !
मरते थे दुनियावाले जिसपर। 
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मौत चौक-चौराहोंं में मिलने लगी
 मनहूसियत गलियों में खिलने लगी
मुक्तिधाम में बिलख रही है मासूमियत
कौन करे किसी के कर्म का हिसाब
पशुता मानवता को छलने लगी

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हमक़दम  के इस सप्ताह का
विषय जानने के लिए देखिए

आज के लिए इतना ही
आप सभी की बहुमूल्य प्रतिक्रिया की
प्रतीक्षा में

श्वेता सिन्हा

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