शीर्षक पंक्ति: आदरणीया शैल सिंह जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-
871.
सीमाएं
जो मैं कर पाया,
वह बहुत अच्छा था,
पर जो कर नहीं पाया,
उसको कर न पाने से
मैं उदास रहता हूँ।
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अहंकार का भोजन दुख है
नहीं सरल समर्पण की राह
पीड़ा से होकर जाती है,
पर इक दिन बन जाती क्रीड़ा
दुनिया सुखमय हो जाती है!
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जादुई झोला
नियति उसे
डाँटती-फटकारती है।
एक उम्र तक
दोनों खूब झगड़ते हैं।
फिर
एक दिन
कवि झोले में हाथ डालता है।
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खुल कर जियो आज में ज़िन्दगी
कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी
की नहीं कोई कहानी
धुवें के छल्ले की तरह उड़ा
दें हंस के सारी परेशानी
ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा
देते ठोकरों से सावधानी
अपनी मौज में रह सीखें सलीका
जीने का आसानी।
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व्यक्ति पूजा
व्यक्ति पूजा का जैसा हाल
वर्तमान में है, वैसा शायद ही कभी
रहा हो ! आज अधिकांश लोग किसी के भी नाम, दाम या व्यक्तित्व के मायाजाल में फंस कर उसके मुरीद बन जाते हैं ! उन्हें
सामने वाले की मानसिकता, उसकी नैतिकता, उसके चरित्र से
कोई मतलब नहीं होता, उनके लिए अपने
आदर्श के मुख से निकली बात ही ब्रह्म-वाक्य होती है ! ये लोग उसके
विरुद्ध कोई सच्ची बात भी सुनना भी गवारा नहीं करते ! इतना ही नहीं अपने अगड़े का
प्रतिद्वंद्वी उन्हें दुश्मन सरीखा नजर आने लगता है। यह बात आज चहूं ओर नजर आ रही
है !
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह
यादव
सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
रवींद्र जी ने बिल्कुल सही कहा है, आज व्यक्तित्व में सेवाभाव, आत्मा, परोपकार, पुराने जमाने की बात हो गई है और सब गायब है, इसके बावजूद उनका प्रॉपगंडा, तिलस्म सबको भ्रमित करके रखता है और उपासक भी उससे बाहर नही निकलना चाहता है , साभार - एस के लोहिया
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