जब मेरे गधे के कान ढीले हो कर नीचे लटक जाते हैं, मैं समझ जाता हूँ वर्षा होने वाली है,
और मेरा गधा कभी ग़लत साबित नहीं हुआ!
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय राहुल उपाध्याय जी की
रचना से।
सादर अभिवादन।
आज गणेश चतुर्थी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.
आज ही हिंदी दिवस भी है, हार्दिक शुभकामनाएँ.
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
ऋषिवर!पूत हमारा अनुशासित,
सदा मातु पिता गुरु आज्ञाकारी।
गंगा विनय कर रही बार बार,
पूतहि शिष्य बना लो एक बार।।
और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
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याद आता है वो बचपन का स्कूल प्यारा-प्यारा |
Kasturba School Reunion गीत | 2
October Alumni Meet
छूट गया वो घर और स्कूल का
प्यारा मंज़र,
बीत गए पचास-साठ साल
ज़िंदगी के सफ़र।
पर बचपन का वो स्कूल दिल से
न उतर पाया,
वही निश्छल पुराना प्यार
फिर से लौट के आया!
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सूफ़ीमत...11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-5
सूफ़ी दर्शन में जीव ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है, और भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होना, यही उसका सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत
भी ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है। जीव को हक़ (सत्, ब्रह्म) से मिलने का एक ही रास्ता है, वह है - प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक
प्रेम होता है। अलहक्क़ के साथ एकत्व
प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। सूफ़ी संत सरमद ने सूफ़ी
प्रेमोपासना का रहस्य इन शब्दों में बताया है –
मुमकिन न बुबद कि
यार आयद बकिनार,
ख़ुदरा अज़ ख़्याले
ख़ामो अन्देशा बरार,
हर चीज़ क़ि ग़ैर
अस्त दर सीनए तुस्त,
बिसयार हिजाबेस्त
मियाने तो व यार!
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अम्र उजाला
शब्द सम्मान 2026: साहित्य की विभूतियों
के सम्मान का आठवाँ पड़ाव, 30 सितंबर तक
नामांकन
भारतीय भाषाओं
के सामूहिक स्वप्न को सम्मानित करने वाले अमर उजाला शब्द
सम्मान के अंतर्गत इस वर्ष भी दो आकाशदीप अलंकरण और पाँच श्रेष्ठ कृति सम्मान प्रदान किए जाएंगे।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह
यादव
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,
अब थी निराश काशी नरेश बाला।
अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,
नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।
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और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
तुलसीदास जी की लिखी पंक्तियॉं-
"भादों नदीं जल जाहिं सुहाई।
खल बल पाइ करहिं प्रभुताई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जनु जीवहि माया लपटानी॥"
अर्थात्: भादों के महीने में नदियाँ उमड़कर चलती हैं, जैसे नीच व्यक्ति थोड़ा-सा बल (धन-दौलत) पाकर अपनी प्रभुता दिखाने लगता है। और जैसे वर्षा का जल पृथ्वी पर गिरते ही मटमैला हो जाता है, ठीक वैसे ही जीव पृथ्वी पर जन्म लेते ही माया से लिपट जाता है।
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आप ने दृश्य और भाव बिंबों का ऐसा सूक्ष्म ताना-बाना बुना है कि पाठक न केवल उस हादसे को अपनी आँखों से घटते हुए देख रहे है, बल्कि उस 'बीमार दिन' की तड़प को अपने भीतर महसूस भी कर रहे है।
हरीश कुमार जी आपकी रचना में जीवन के शाश्वत सत्य, वक़्त के परिवर्तनशील स्वभाव और मानवीय गरिमा को आपने एक बेहद खूबसूरत और विचारोत्तेजक काव्य में पिरोया है।
अनिता जी आपकी डायरी के पन्नों में लिखी गई एक अत्यंत आत्मीय और चिंतनशील अभिव्यक्ति है, जिसमें आपने दैनिक जीवन के अनुभवों, कला, साहित्य और मानवीय संबंधों के गहरे पक्षों को उजागर किया है।