शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशरफी लाल मिश्र जी रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
अपहरित बाला मुझे स्वीकार नहीं,
अब थी निराश काशी नरेश बाला।
अंबा का था अब अनुरोध देवव्रत से,
नीति कहती आप मुझे स्वीकार करें।।
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कुछ बन्धन
हँस-हँस के जीते
गर प्यार हो।
4.
ज़ख्म फूलों से
प्यार में मिलता है
नादान हूँ न!
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कहीं और सूरज वैसे निकलता ही नहीं।
चाँद में वह ख़ूबसूरती कहीं और नज़र ही नहीं आती।
खाने में वह ज़ायका नहीं मिलता,
बातों में वह बात नहीं होती,
और हँसी में वह खिलखिलाहट नहीं घुलती।
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और याद है
आपने उस दुश्मन को कैसे पछाड़ा था? उस बाहुबली को
कैसे मारा था?
उस दिन के तो क्या ही कहने
आप अकेले ने दस-दस को गिराया था
तो इसे तलवे चाटना कहा जाएगा
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव