शुक्रवारीय अंक में आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन।
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कलैंडर में बदलती तारीख़ों के हिसाब़ से आज का यह अंक इस वर्ष का अंतिम शुक्रवारीय अंक है।
कैलेंडर की मात्र तारीख़ ही बदलती है अनवरत चलते कालचक्र पर जीवन के अनिश्चित,अनदेखे,अनजाने रास्तों पर अन्य कोई बदलाव नहीं होता है।
पल स्मृतियों में बदल जाते हैं , परिस्थितियों और सहूलियत के अनुसार रिश्ते बनते और बिगड़ते है।
परंतु जीवन की निराशा, नकारात्मकता, विषमताओं में भी नयी तारीखें आने वाले समय में कुछ अच्छा होगा कहकर धीरे से मुस्काती हैं और संजीवनी-सा संदेश दे जाती हैं।
आइये हम भी आने वाले निर्जीव पलों को अपने कर्मों से छूकर सजीव कर दें।
अनदेखे-अनजाने दिवस के रिक्त पलों में
जाने कौन से पल कब जीवंत हो जायेंगे?
समय के पाँसे जीवन से खेलते हैंं हरपल
अगले दाँव में 'क्या' प्रश्न ज्वलंत भरमायेंगे
तारीख के पत्थर पे जो गढ पाये पाँव के निशां
स्मृतियों के संग्रहालय में वही सजाये जायेंगे।
#श्वेता
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आइये हम आज की रचनाओं का आनंद लेते हैं-
टुकडे-टुकड़े हो जाते हैं
सर्द है रुत, है सर्द हवा
और सर्द सुलूक तुम्हारा है !
बर्फ से ठंडे अल्फाजों से,
अपने दिल को बहलाते हैं।
झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा
वक्त चुराना होगा !
समय गुजर ना जाए यूँ ही
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को
अंतर्मन में बीज पड़ा है !
कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा
वक्त चुराना होगा !
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यह भी ठीक है कि
एक पासे से तुम
सीढ़ी के सहारे
अर्श पे पहुंचा देती हो
तो दूसरे पासे से
सांप के सहारे
फर्श पे
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नयना काजल रेख है ,और बिॅ॑दी है भाल ,
बनठन के गोरी चली ,ओढ़ के चुनर लाल ,
ओढ़ के चुनर लाल , नाक में नथनी डोली ,
छनकी पायल आज , हिया की खिड़की खोली ,
कैसी सुंदर नार , आंख लज्जा का गहना ,
तिरछी चितवन डाल , बाण कंटीले नयना ।।
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महकती रही ग़ज़ल
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महकती रही ग़ज़ल
जब भी मेरे ज़ेहन में संवरती रही ग़ज़ल
तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल
झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की
और उंगलियाँ एहसास की लिखती रही ग़ज़ल
पुकारती पगडंडियाँ।
इस ओर फिर कदम बढ़ा।।
माटी को आके चूम लो।
एक बार गांव घूम लो।।
हम अब भी अतिथि को पूजें
हैं ऐसे संस्कार।।
" पर इन आदमियों के समाज में ऐसा नहीं होता। ये इंसान ... इंसान नाम से कम और अलग-अलग लिबासों में हिन्दू ... मुसलमान जैसे नामों से जाने जाते हैं। कोतवाल और वकील के नाम से जाने जाते हैं। सबने अपने-अपने अलग-अलग रंग तय कर रखे हैं - गेरुआ, हरा, सफेद,ख़ाकी और भी कई-कई ... "
हमारे यहाँ कौन शाकाहारी , कौन मांसाहारी या सर्वाहारी है, हम आसानी से इनके खाल के रंगों से पहचान लेते हैं। इनके समाज में पहचानना बहुत ही मुश्किल।
★★★★★★★
आज का यह अंक आपसभी को.कैसा लगा?
आपकी प्रतिक्रिया उत्साहित करती हैं।
हमक़दम का विषय है
औकात
औकात
कल की प्रस्तुति पढ़ना न भूले कल आ
रही हैं विभा दी
एक विशेष अंक लेकर।










