सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य।
पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं।
गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका।
उन्नीसवीं सदी में गद्य में एक नई विधा का विकास हुआ
जिसे कहानी के नाम से जाना गया। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है।
गल्प= गप भावपूर्ण या विचार-प्रधान
कहानी सुनने-सुनाने की भारतीय पद्धति को कथा कहते हैं
घर में बजी शहनाई , तब फिर बंटी मिठाई |
सुन्दर सलोनी मॉडर्न , बहू भी घर में आई ||
मम्मी के दुःख के दिन अब, ढलने लगे थे सुख में |
बहू नहीं बेटी है , हर वक़्त था यह मुख में ||
मोती कुत्ता है बाहर बैठा, उसकी सीधी पूंछ करो तुम,
पूरा जब हो काम तुम्हारा, तब ही आना पास मेरे तुम.
पति से जाकर के वह बोली, अब तुम बिना डरे सो जाओ,
आलस को है तुम तज करके, कल से स्वयं खेत में जाओ
और फिर जोर से चिल्लाया...
‘कुछ तो शर्म कीजिए, जानवर और इंसान में फर्क कीजिए
ऐसा वादा इंसानों में किया जाता है,
कह के कुछ और कुछ और किया जाता है
हम मौत से भाग रहे थे
एक दिन हमें अचानक मालूम हुआ
कि वो हमारे पीछे-पीछे चल रही थी
हमारा हर क़दम मौत के आगे था
और उसका हर क़दम हमारे पीछे
नहीं समय पर उठती थी वो, ना करती थी काम,
नहीं समय पर पढ़ती थी वो, ना स्कूल का काम
जब भी उसको काम बताओ बन जाती बीमार,
हरदम नये बहाने गढ़ती, थी बेहद मक्कार
फिर मिलेंगे .... ओह्ह ... थोड़ा तो ठहरिये
तुम मेरी जिंदगी हो...
और मै तुम्हारी याद ही सही...
पर वो जिंदगी भी क्या..
जिसमे मेरी जिंदगी तुम नही .
><
चलिए अब बारी है हम-क़दम के
छठवें क़दम की ओर
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
आप अपनी रचना आज
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
छठवें क़दम की ओर
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
आप अपनी रचना आज
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चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
19 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक
11 जनवरी 2018 का अवलोकन करें
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