सादर अभिवादन।
बाज़ार आजकल दिन निर्धारित करता जा रहा है विभिन्न गतिविधियों,परम्पराओं और रिश्तों के लिये। हमने जितना बाज़ार को आलोचा और कोसा वह उतना ही हमारी ज़िन्दगी में अतिक्रमण कर गया।
बीता हुआ कल जज़्बातों के कारोबार का दिन बन गया है। लोग इस दिन ख़ुश होते हैं तो इसका विरोध व्यर्थ का चिंतन है क्योंकि अब ज़िन्दगी में ख़ुश होने के मौक़े घटते जा रहे हैं। कम से कम एक दिन तो रुमानियत के लिये हो जब दिमाग़ पर बोझ न हो और दिल की बात हो लेकिन ध्यान रहे हम अंधानुकरण से आगाह हों और प्यार की पवित्रता को बनाये रखें।
अब एक और दिन की चर्चा कर लेते हैं।
13 फरवरी अब "विश्व रेडियो दिवस" घोषित किया गया है
यूनेस्को द्वारा। स्पेन के प्रयासों से यह संभव हो पाया। पहला
विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी 2012 को मनाया गया।
रेडियो के आविष्कारक जी. मारकोनी माने जाते हैं।
यूनेस्को द्वारा। स्पेन के प्रयासों से यह संभव हो पाया। पहला
विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी 2012 को मनाया गया।
रेडियो के आविष्कारक जी. मारकोनी माने जाते हैं।
भारत में रेडियो सेवाओं की शुरुआत सन 1930 में हो गयी थी।
आगे चलकर सन 1956 में ऑल इंडिया रेडियो का नाम "आकाशवाणी"
हो गया। सरकारी दख़ल को कम करने के मक़्सद से सन 1990 में
प्रसार भारती एक्ट आया जिसके तहत आकाशवाणी एवं दूरदर्शन
को साथ मिला दिया गया।
आगे चलकर सन 1956 में ऑल इंडिया रेडियो का नाम "आकाशवाणी"
हो गया। सरकारी दख़ल को कम करने के मक़्सद से सन 1990 में
प्रसार भारती एक्ट आया जिसके तहत आकाशवाणी एवं दूरदर्शन
को साथ मिला दिया गया।
अफ़सोस कि आज भी इन्हें सरकारी भोंपू ही कहा जाता है।
मनोरंजन के लिए रेडियो पर अनेक कार्यक्रम आने लगे। लोगों का मनोरंजन के लिए सीलोन रेडियो की ओर ज़्यादा झुकाव होने का अध्ययन किया गया और सन 1957 में आकाशवाणी की सर्वाधिक लोकप्रिय सेवा "विविध भारती" को प्रारम्भ किया गया।
आज़ादी के बाद भारत में भी वर्षों तक जनता को रेडियो ,टेलिविज़न और साइकिल के लिये लायसेंस की प्रक्रिया पूरी करनी होती थी।
1992 से 2003 तक आकाशवाणी ग्वालियर से मेरा वास्ता रहा तो
रेडियो पर अपने विचार साझा करने का मन हुआ।
रेडियो पर अपने विचार साझा करने का मन हुआ।
भेंट-वार्ताओं पर आधारित कार्यक्रमों को तैयार करते समय
अनेक रोचक अनुभव मिले।
अनेक रोचक अनुभव मिले।
चलिए अब आपको ले चलते हैं आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर -
आदरणीया आशालता सक्सेना जी के सार्थक चिंतन की झलक का आनंद लीजिए उनकी प्रस्तुत हाइकु श्रृंखला में -
हाईकू......आशालता सक्सेना

वह सक्षम
निर्भय व साहसी
नारी सबल
नारी सबला
अवला न समझो
है आधुनिका
जीवन की विविध परिस्थितियों में एहसासों के ख़ूबसूरत रंग भरती आदरणीया रेणु बाला जी की हृदयस्पर्शी रचना आपकी नज़र -
तुम ! वाणी रूप और शब्द रूप ,
तुम ! स्नेही मन- सखा मेरे ;
स्नेह की डोर में बांधे रखते -
तुम्हारे सम्मोहन के घेरे ;
थाम इसे -जीवन के पार कहीं -
आ तुझमें मिल जाऊंगी मैं -
चाँद नगर सा गाँव तुम्हारा -
भला ! कैसे वहां पहुँच पाऊँगी मैं ?
आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव"राही" जी आपके लिए लाये हैं एक ख़ूबसूरत और दुर्लभ चित्रावली अपने फोटो-ब्लॉग के ज़रिये -
फोटोग्राफी : पक्षी 48 . ..राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
खकूसट, खूसटिया या छुघड एक छोटा उल्लू है
जो उष्णकटिबंधीय एशिया, मुख्यतः भारत से दक्षिण पूर्व
एशिया तक, में पाया जाता है। इसे खेत, खुली जगहों
एवं शहरों में आम पाया जाने वाला पक्षी है। ये चट्टानों
या इमारतों में, पेड़ों के छिलकों या गुहा में रहते हैं।
प्रेम का शाश्वत रंग उकेरा है आदरणीया मीना जी ने जोकि
बिषय में रहस्य और गूढ़ता को पिरो देने में कुशल हैं। प्रस्तुत
रचना का शब्द-शब्द दिल की गहराइयों में उतरता जाता है और
वाचक को किसी रंज के एहसास में डुबो देता है -
बिषय में रहस्य और गूढ़ता को पिरो देने में कुशल हैं। प्रस्तुत
रचना का शब्द-शब्द दिल की गहराइयों में उतरता जाता है और
वाचक को किसी रंज के एहसास में डुबो देता है -

उन हवाओं को सँभालना
जो उनकी साँसों से घुलकर
मेरी साँसों में उतरी थीं
सूखने ना देना उन आँसुओं को,
जो मेरे गालों पर बहने से पहले
उनकी आँखों से होकर गुजरे थे !
आदरणीया श्वेता जी की काव्य-यात्रा नई ऊंचाइयों की
उड़ान भरती प्रतीत होती है प्रस्तुत रचना में,
उड़ान भरती प्रतीत होती है प्रस्तुत रचना में,
जहाँ आपको यथार्थ का धरातल और कवियत्री के
कल्पनालोक का शानदार परिचय मिलेगा-
कल्पनालोक का शानदार परिचय मिलेगा-

तुम्हारी बातों की चुभन झटकने की कोशिश में
देखने लगती हूँ
नीेले आकाश पर टहलते उदास बादल
पेड़ों की फुनगी से उतरकर
खिड़की पर आयी गौरेया
जो मेरे चेहरे को गौर से देखती
अपनी गुलाबी चोंच से
परदे को हटाती,झाँकती, फिर लौट जाती है
चुपचाप
देखने लगती हूँ
नीेले आकाश पर टहलते उदास बादल
पेड़ों की फुनगी से उतरकर
खिड़की पर आयी गौरेया
जो मेरे चेहरे को गौर से देखती
अपनी गुलाबी चोंच से
परदे को हटाती,झाँकती, फिर लौट जाती है
चुपचाप
आदरणीया निर्मला कपिला जी की ग़ज़ल में जीवन की अलग-अलग परिथितियाँ बयां करते शेर मुलाहिज़ा कीजिये ब्लॉग "मेरी धरोहर" पर जिसे पेश किया है आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी ने -
नदी को सागर मिला नहीं है.....निर्मला कपिला
शरर ये नफरत का किसने फेंका
जो आज तक भी बुझा नहीं है
किसी को शीशा दिखा रहा जो
वो दूध का खुद धुला नहीं है
आइये चलते-चलते "उलूक टाइम्स" की नवीनतम प्रस्तुति
का रसास्वादन करें जोकि अनछुए और उपेक्षित बिषयों पर
हमारा ध्यान आकृष्ट करती है -
का रसास्वादन करें जोकि अनछुए और उपेक्षित बिषयों पर
हमारा ध्यान आकृष्ट करती है -
एक पन्ने पर कुछ देर रुक कर अच्छा होता है आवारा हो लेना
पूरी किताब लिखनी जरूरी है कहाँ लिखा होता है
प्रोफ़ेसर डॉ. सुशील कुमार जोशी

खाली
सफेद पन्ने भी
पढ़े जा सकते हैं
लिखना छोड़ कर
किसी मौसम में
‘उलूक’
खुद ही पढ़ने
और
समझ लेने
के लिये
खुद लिखे गये
आवारा रास्तों
के निशान।
चलिए अब बारी है हम-क़दम के
छठवें क़दम की ओर।
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर बढ़ चला है।
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
आप अपनी रचना शनिवार 17 फरवरी 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 19 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक
11 जनवरी 2018 का अवलोकन करें (इस लिंक को क्लिक करें)
छठवें क़दम की ओर।
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर बढ़ चला है।
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
आप अपनी रचना शनिवार 17 फरवरी 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 19 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक
11 जनवरी 2018 का अवलोकन करें (इस लिंक को क्लिक करें)
आज के लिए बस इतना ही। मिलते हैं फिर अगले गुरूवार।
कल आ रही हैं श्वेता जी अपनी प्रस्तुति के साथ।
रवीन्द्र सिंह यादव