१०जनवरी२०१७
।।प्रातः वंदन।।
अलमस्त सुबह के नज़ारे ही कुछ और है
आलम यह कि सूरज भी लिहाफ में जा बैठे
खूबसूरती यह कि
चाय की चुस्कियों में वो सकून पर..
नजारों ने कच्ची धूप की भी सिफारिश की है..
तो फिर आज इसी सिफारिश के साथ हम नजर डालते है आज की लिंकों की ओर..✍
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तुम जानते तो हो ही न मीता तुम्हे क्या बताना
---------जाड़े की गुनगुनी दोपहर चहकती गुनगुनाती हैं
तो शामे एक गहरी उदासी से भरने लगती है -------------------रात गहराती है और अवसाद से भर जाती है
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द्वितीय रचनाकार विक्रम प्रताप सिंह 'सचान'
यूँ तो लोककलायें हमारी संस्कृति की ध्वजवाहक है। किन्तु आधुनिकता से निरन्तर संघर्ष कर क्षरित होने को मजबूर है। सदियों पहले "नगर सेठों" का प्रभाव हुआ करता था। नगर वधुएँ भी हुआ करती थी। तब लोककलायें अमूमन नगर सेठो के अधीन हुआ करती थी। उनकी महफ़िलो की साज सज्जा और
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तृतीय है.. आदरणीया जेन्नी शबनम जी,
ग़ैरों की दास्ताँ क्यों सुनूँ?
अपनी राह क्यों न बनाऊँ?
जो पसंद बस वही क्यों न करूँ?
दूसरों के कहे से जीवन क्यों जीऊँ?
मुमकिन है ऐसे कई सवाल कौंधते हों तुममें
मुमकिन है इनके जवाब भी हों तुम्हारे पास
चतुर्थी है.. रचनाकार पूजा शर्मा राव जी
वक़्त की एक
महीन दहलीज़ थी
बाहर खुली हवा थी
आसमान था
हथेली से छू जा सके वाले
रंग थे
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अंत में रूबरू होते है रचनाकार रवीन्द्र सिंह यादव जी की रचना..
कैसा दौर आया है
आजकल
जिधर देखो उधर
हवा गर्म हो रही है
आया था चमन में
सुकून की सांस लेने
नहीं करनी निंदा किसी की
पर सच..
सच से भी नहीं एतराज़ है..।
।।इति शम।।
पम्मी सिंह
धन्यवाद..✍
हम-कदम
हम एक नया कार्यक्रम करना चाहते हैं आपके साथ
विस्तृत विवरण कल गुरुवार की प्रस्तुति मे देखिए
कार्यक्रम है....
एक क़दम आप.....एक क़दम हम
बन जाएँ हम-कदम
...भवदीय...
यशोदा
यशोदा


